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बाईबल क्या है?

नमस्कार मित्र वेद पाठशाला के इस नये कार्यक्रम में हम आपका हार्दिक स्वगत करते है। मित्र यह पाठशाला धर्मशास्त्र अध्यन की एक कक्षा है। जिसमें परमेश्वर के वचन के तीन सौ साठ पाठ का अध्यन हम प्रारंभ से अंत तक करेंगे। ऐसा लगता हैं। कि यह एक लम्बी यात्रा है। परन्तु यह जल्दी ही समाप्त हो जायेगी। इस पाठशाला के विषय में बहुत उत्साहित हूँ और मैं जानता हूँ, कि आप भी उत्साहित होगें। सो मित्र इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए आप योजना बनाये। और दूसरां को भी अवगत कराये, तभी वे सभी इस महत्वपूर्ण पुस्तक के अध्ययनशाला में उपस्थित हो सके। उदाहरण के लिये यदि आप लोगां के साथ दल बनाकर किसी यात्रा में या किसी पवित्र स्थान में जाते है और अनेक वर्षों के बाद जब आप पुनः उनसे मिलते है। तो आप अपने उस पुराने अनुभव को एक-दूसरे को बताते है और आनन्दित होते है। मैं ऐसा अनुभव करता हूँ कि यदि हम इस अध्यन शाला की अगली यात्रा को इसी तरह से प्रारंभ करेंगे, तो बहुत अच्छा होगा। क्यांकि इस सर्वेक्षण में हम पवित्रशास्त्र के 66 पुस्तकां का अध्यन करेंगे, और उन पुस्तकां के सर्वेक्षण के लिये योजना बनायेगे। मित्र इस इन पुस्तकां के सर्वेक्षण के लिये हम निम्न विषयां पर ध्यान करेगें। उसमें पहला है, कि हम प्रत्येक पुस्तक का सारांश देखेगें उसकी महत्वपूर्ण रूपरेखा देखेगें और तीसरा प्रत्येक पुस्तक में से भक्तिपूर्ण संदेशां को देखेगें। अर्थात् हम अपने व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर के वचन को लागू होते देखेगें। श्रोता इस पाठशाला का सर्वेक्षण याजकिय लोगों को निर्देश करता है? और मैं व्यक्तिगत रूप से विश्वास करता हूँ कि संवतः कलीसिया में याजकिय लोग पाये है। जिन्हें हम कलीसिया के सदस्य कहते है। प्रेरित पौलुस अपने दर्शन को हमारे साथ बांटकर कहते है, कि संतां की पूर्णता ही सेवकाई के कार्य है। जिसमें हम सभो को एक साथ आना है। यहाँ पर पौलुस इफिसियां की पत्री उसके चौथे अध्याय 12 पद से हमें सीखा रहे है। कि पवित्र लोग सिद्ध हो जाय और सेवा के कार्य किये जाय, यदि हम सेवकाई के कार्य को होते हुए देखना चाहते है। तो हमें चाहिए कि कलीसिया के लोगां को सिद्ध बनाये। मित्र इस पाठशाला के अध्यन में हमारा यह उद्देश्य है, कि जैसे हम बाईबल के एक-एक पुस्तक का अध्यन करते है। जिससे कलीसिया के अगुआें का विश्वास प्रभावकारी हो सके। और जब वे अपने मित्रां अपने पड़ोसियां अपने परिवारों के पास जाते है। तो वे उनके विश्वास को मजबूत कर सके। जैसे हम पवित्रशास्त्र के उन 66 पुस्तकों का सर्वेक्षण करेंगे। तो मैं आपके बाईबल के कुछ निश्चित भाग पढ़ने को ढ़ूँगा। तभी यह हमारा उद्देश्य पूरा हो सके। समय-समय पर मैं आपको लिखित कार्य भार दूँगा। जिसमें कुछ प्रश्न होगें, जो आपके बाइबल के प्रत्येक पुस्तक का सारांश और भक्तिपूर्ण संदेश, रूपरेखा और अपके व्यक्तिगत जीवन में इन पुस्तकों के वचनां का उपयोग आपके जानने में आपका सहायता प्रदान करेगा। समय-समय पर आपको हम अवसर देंगें, कि आप अपने प्रश्न हमें लिखकर भेजे और हमसे सम्पर्क बनाये रखे, कार्यक्रम के अंत में हमारे उद्घोषक आपको हमारा पता भी बतायेगे। पवित्र बाइबल के 66 पुस्तकां के सर्वेक्षण में जो विस्तृत सामग्री में आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, उसे आप देखेंगें और यदि आपने उत्पत्ति से लेकर प्रकाशित वाक्य तक बाइबल को पढ़ा है। तो आप समझ पायेगें। कि यह एक सामग्री ही है और उसका केवल एक परिचय है। मित्र प्रारंभ से ही मैं आपको यह चुनौती देना चाहता हूँ। कि यदि आप इस अध्यन के कार्य को बोझ से करते है। अर्थात् दिल से करते है, तो यह अध्यन आपके लिये बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। पौलुस प्रेरित कहते है। कि जब बाइबल का विषय हमारे सामने एक कार्यशाला की तरह आता है। तो एक ही बात हमें घबरा देती है। और लज्जित होने दूर रख सकती है। वह है कार्य मित्र बाइबल का समझे का एक मात्र तारिका है। कि हम परिश्रम करे यहाँ पर आपको मैं यह चुनौती देना चाहूँगा। कि इस अध्यनशाला के प्रारंभ से ही आप यह निश्चय करे। कि मैं कोई भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं रहूँगा और जो कार्य मिलेगा, उसे मैं पूरा करूँगा। अनेक लोगां ने इस प्रकार से अध्यन किया और वचन का ज्ञान प्राप्त किया है। और इसी तरह से मित्र यदि आप भी प्रेरित होते है। तो आप भी वचन की गहराईयां को जानने में रूची रखेगें हमने आप लिये बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका भी तैयार की है, जिसमें आपको समझने में सहायता प्राप्त होगी। इसलिए आप अवश्य पत्र लिखकर इसे मुफ्त में प्राप्त कर ले और अपने अध्यन में इसका उपयोग करे। हमारे इस अध्यनशाला के प्रारंभ में आपको मैं और कुछ कहना चाहूँगा। कि जैसे हम इस अच्छे यात्रा में आगे बढ़ते है। तो आपको चाहिए, कि आप उन औजारां को अपने पास रख ले। जैसे आप जानते है। कि एक बढ़ई, एक मिस्त्री, एक दांत का डॉक्टर, एक घड़ी सुधारक इन सभो के पास अपनी-अपनी औजारे होती है। और उन्हें ये मामूल होता है कि किस प्रकार किस समय इन औजारां का उपयोग किया जाय? सो मित्र जैसे आप धर्मशास्त्र के इन गंभीर वचनों का अध्यन करने जा रहे है। तो आपको भी कुछ महत्वपूर्ण औजारां की आवश्यकता है। जिन्हें मैं आपको बताना चाहता हूँ। पहला औजार है, जो स्पष्ट है, और वो है आपकी बाइबल में आपको सलाह देना चाहता हूँ कि आप एक अच्छी बाइबल अपने पास रखे और वचन को स्मरण रखने के लिये आप उसमें चिन्ह अंकित करे। जब आप ऐसा करेंगे। तो उन पदां से आप अच्छी तरह से परिचित हो जायेगें और अनेक वर्षों तक आप बाइबल का अध्यन कर पायेगें। सो मित्र यदि आप इस अध्यन में रूची रखते है, तो मेरी यह सलाह है, कि आप एक अच्छी बाइबल को अपने पास रख ले। आजकल बहुत अच्छे-अच्छे अनुवाद के बाइबल मिलते है। जो पढ़ने में और समझने में बहुत ही सरल है। उनमें से दो-तीन प्र्रकार के बाइबल आप रख ले। जिससे आपको समझने में सहायता मिलेगी। दूसरा औजार जो बाइबल अध्यन में आपको रखना है। वह है, बाइबल शब्दकोष यह शब्दकोष वो पुस्तक है। जो आपको बाइबल के लिखे प्रत्येक लोगां के विषय प्रत्येक स्थान के विषय प्रत्येक वस्तु के विषय और उनके अर्थ के विषय में बतायेगी। अगला महत्वपूर्ण औजार है, शब्दानुक्रमाणिका ये वो पुस्तक है। जो आपको बाइबल के प्रत्येक शब्दों को बतायेगी। कि वो कहा पाये जाते है। यदि आपके पास यह पुस्तक है तो आप वचन का अध्यन भालि-भाँति कर सकते है, और कोई भी विचार कोई भी विषय लेकर उसे उस पुस्तक में देख सकते है, और वो पुस्तक आपको बाइबल के उत्पत्ति से लेकर प्रकाशित वाक्य तक उन शब्दों को बतायेगी। जहाँ-जहाँ उनका उपयोग हुआ है। इसलिए बाइबल के विद्वान इस पुस्तक को बहुत प्रसंद करते है। दूसरी बता की इस पुस्तक से हम उन पदों को ढँ़ूढ़ सकते है। जिसे हम जानते तो है पर कहा लिखे है। वो हम याद नहीं रहते जैसे एक पद है। कि रूपियों का लोभ सब बुराई की जड़ है। ये कौन-सी पुस्तक के किस अध्याय के किस पद में लिखे है? बहुत से बार हम अनेक वचनों को नहीं जान सकते परन्तु यह पुस्तक हमारी सहायता करती है, और हमें बताती है। मित्र यदि हमें उस पद को ढूँढ़ना है, तो इस पुस्तक में से देखे जहाँ रूपियां लोभ, बुराई, और जड़ लिखा हुआ है और किसी भी एक शब्द को देखकर बहुत ही जल्दी हम उस पद को प्राप्त कर सकते है। श्रोता बाइबल सर्वेक्षण के लिये कुछ और औजार है जो अध्यन में सहायक सिद्ध होते है और उनके लिये भी मैं आपसे अनुरोध करता हूँ। कि आप उन्हें प्राप्त कर ले बाइबल की कुछ टिका पाये जाते है, और हमारी बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका की भी एक छोटी टिके के जैसे ही है। यदि आप हमसे सर्म्पक करके इसे प्राप्त कर लेते है, तो यह अध्यन में आपके लिये सहायक सिद्ध होगी। अर्थात् यदि कोई आपको इस विषय में प्रश्न पूछे तो आप इसके द्वारा सही उत्तर दे सकते है। फिर अध्यन के समय आपके पास कागज व कलम होनी चाहिए, ताकि आप कुछ महत्वपूर्ण बातां को लिख सको और उनको याद रख सको। ध्यान रहे मित्र कि हम एक लम्बी यात्रा को आरंभ कर रहे है। सो कृप्या अपने औजार अपने पास अवश्य रख ले और कभी भी इस अध्यनशाला में चुके नहीं परन्तु बराबर उपस्थित रहे। सुसमाचारों में हमें बताया गया है। कि प्रभु यीशु मसीह मुर्दो में से जी उठने के पश्चात् चेलां के पास गये और उन्हें बाइबल कि सच्चाइयां को बताया और चेले अपने जीवन में प्रथम बार बाइबल को समझे और उस सच्चाई ने उनके समझ को खोला कि वे बाइबल को समझ सके मेरे मित्र आत्मा की अगुवाई से मैं उन सच्चाईयों को आपके साथ बांटना चाहता हूँ और आशा करता हूँ। कि यह सच्चाई बाइबल को समझने के लिये आपकी समझ को अवश्य खोलेगी। मित्र मैं सबसे पहले चाहूँग। कि हम बाइबल की परिभाषा और व्यख्या के उपर विचार करे कि बाइबल क्या है? अधिकांश बाइबलां के शीर्षक पवित्रशास्त्र होता है। अर्थात् पवित्र बाइबल मित्र इसका क्या अर्थ होता है? ये बाइबल शब्द जो है, वो विविलिया शब्द से आता है। जिसमें बहुवचन पाये जाते है। यदि आप इसके प्रारंभिक शब्द को देखेगें, तो यह कहता है। पुस्तके अर्थात् केवल एक ही पुस्तक नहीं परन्तु बाइबल 66 पुस्तकों का संग्रह है, और जब हम कहते है कि यह पुस्तक पवित्र पुस्तकों का एक संग्रह है, तो इसका अर्थ क्या होता है? मित्र पवित्र शब्द का अर्थ है, जो परमेश्वर का है या जो परमेश्वर की ओर से आता है। यहाँ पर परमेश्वर इन पुस्तकां के साथ कुछ महान कार्य करने को क्रियाशील है। सो यह पुस्तक परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिये महान पुस्तक है, और इसी लिए यह पुस्तक एवम् इसका अध्यन संसार में एक महत्वपूर्ण अध्यन है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसने हमें ये अवसर दिया कि उसकी इस महान पुस्तक का अध्यन हम कर सकते है। आपने सुना होगा। कि कई लोग इसे परमेश्वर का वचन कहते है। मित्र जब हम इसे परमेश्वर का वचन कहते है तो इसका अर्थ हम क्या समझते है। क्यांकि यह परमेश्वर की ओर भविष्यवक्ता और प्रेरितों द्वारा बताया गया है। 2तिमुथियुस उसका तीसरा अध्याय 16 और 17 पद में पौलुस प्रेरित ने पवित्रशास्त्र के विषय जो विवरण व्यक्त किये है। वो इस प्रकार है। हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है। और उपदेश और समझाने और सुधारने और धर्म की शिक्षा के लिये लाभ प्रद है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने और हर एक भले कार्य के लिये तत्पर्य हो जाये। सो मित्र वचन में जो शब्द लिखे गये है। वो मनुष्यों के नहीं परन्तु वे सब परमेश्वर के शब्द है। इस पुस्तक को लिखने में लगभग 1500 से 1600 वर्ष लगे है, और उन लोगां का लिखना पुस्तकां का एक संग्रह बना। जिसे आज हम पवित्र बाइबल कहते है। प्रायः सभी बाइबलां के शीर्षक में पवित्रशास्त्र लिखा होता है, और जब हम इस पुस्तक को पवित्रशास्त्र कहते है। उसका क्या अर्थ होता है? पवित्र शब्द का अर्थ है? कि वो परमेश्वर की तरफ से है या वो परमेश्वर की ओर से आता है इसका उद्गम स्वयं परमेश्वर है। यहाँ पर हम जो कहना चाहते है, वो ये है, कि यह पुस्तक परमेश्वर से विशेष रूप से सम्बन्धित है, और यह पुस्तक संसार में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसलिये पवित्रशास्त्र का अध्यन भी इस संसार में एक महत्वपूर्ण अध्यन है और तभी मित्र परमेश्वर के पास एक संदेश है। जिससे वो मनुष्य के साथ सम्बन्ध बनाना चाहता है। वे अनेक लोगों के जीवन में चले फिरे विशेष कर उन चालीस लोगों के साथ जिन्होंने परमेश्वर से प्ररेणा पाकर परमेश्वर के वचन को लिखा 1500 से 1600 वर्ष के अंतराल में इन लोगां ने इन किताबों को लिखा जिसे आज हम पवित्रशास्त्र कहते है, और जिस प्रक्रिया से परमेश्वर ने इस लोगां में होकर कार्य किया वो था। परमेश्वर की प्ररेणा पौलुस कहते है कि ये पुस्तके परमेश्वर की प्ररेणा से परमेश्वर द्वारा आयी, प्ररेणा शब्द का अर्थ है। स्वांस लेना और पवित्र आत्मा की समार्थ से परमेश्वर के स्वांस ने इनमें होकर कार्य किया कि वे इन पुस्तकों को लिख सके। पतरस इस वचन को इस तरह से वर्णन करते है। कि हम प्रभु यीशु मसीह के आगमन और उनके सामर्थ को जानने के बाद चतुराई का पीछा नहीं करते पर ये हमारे आखां देखी बात है और पवित्रशास्त्र की कोई भी भविष्यवाणी किसी के अपने ही विचार धारा के आधार पर पूर्ण नहीं हुई, क्योंकि कोई भी भविष्यवाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त लोग पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की सामर्थ से बोलते थे। प्रेरित पौलुस बताते है। कि जिस प्रक्रिया से पवित्रशास्त्र आया वो था। परमेश्वर की प्रेरणा पतरस बताते है। कि ये प्रेरणा क्या है? फिर वो कहते है। यह संदेश जिन्हें मनुष्यां ने लिखा वो उनकी स्वयंम् की विचार धारा नहीं थी। परन्तु वे परमेश्वर द्वारा उत्पन्न हुए थे। इस प्ररेणादायक पुस्तक में जितने भी संदेश लिखे गये है। वो सब परमेश्वर के हृदय से उत्पन्न हुए है। परमेश्वर पिता इन संदेशों से पवित्रआत्मा की सामर्थ के द्वारा मनुष्यों से सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। पतरस ने ग्रीक भाषा में एक सुंदर शब्द का प्रयोग किया है, और वो शब्द है। हेरो अनेक स्थानों पर पुल की जगह नौका का उपयोग होता है, और यह सच है, कि जिन क्षेत्रां में अधिक पानी होता है। हम उन क्षेत्रों में नाव का उपयोग करते है। जो हमें एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाती है और यह नाव जो एक छोर से दूसरे छोर ले जाती है। वह नौका कहलाती है। ग्रीक शब्द हेरों का अर्थ यही है। पतरस भी इसी शब्द का प्रयोग करता है, और कहता है। कि परमेश्वर इन लोगां में होकर चलते है। दूसरा स्पष्टीकरण है। परमेश्वर का जीविंत वचन ओ प्रभु यीशु मसीह में लागू होता है। धर्मशास्त्र परमेश्वर का लिखा हुआ वचन कहलाता है। परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने कहा परमेश्वर का वचन जीवित और पवित्र है। परमेश्वर ने इस पुस्तक के द्वारा हमसे बड़ी और महान बाते कही है। परन्तु परमेश्वर ये भी कहते है, कि वो अपने पुत्र प्रभु यीशु मसीह के द्वारा और भी बड़ी-बड़ी और महान बाते हमसे कहते है। परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह के जीवन और उनकी शिक्षाओं के द्वारा संसार से अधिक बाते कहीं इसलिए प्रभु यीशु मसीह इसे परमेश्वर का जीवित वचन कहते है। हम कहते है, कि पास्टर परमेश्वर के वचन का प्रचार करते है। हाँ मित्र परमेश्वर के वचन का प्रचार करना महान और अद्भूत बात है। किसी ने इस तरह से इसे वर्णन किया है। कि परमेश्वर के वचन का प्रचार करना, परमेश्वर के आत्मा से परमेश्वर के दासों के द्वारा होता है। जिससे परमेश्वर के संतान तैयार होते है। पौलुस कहते है, क्रूस की कथा नाश होने वालां के निकट मूर्खता है। पर हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ है, और मित्र यह परमेश्वर को भाता है। क्यांकि लोग विश्वास करते है, और उद्धार पाते है, पौलुस इसे नहीं समझ पा रहे थे। परन्तु उन्हांने विश्वास किया और उसके लिये वे समर्पित हो गये। जब उन्हांने प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार का प्रचार किया, तो लोगां ने उद्धार पाया और परमेश्वर की संतान बन गये मित्र अब मैं आपको बाइबल के कुछ संगठन के बारे में बताना चाहता हूँ। ये 66 पुस्तके उस तरह से नहीं रखे गये है। जिस तरह से वो लिखे गये है या उनके लेखक जीवित रहे है। आप ऐसे विचार करते होगें परन्तु यह ऐसा नहीं है। वे पुस्तके बाइबल में उस तरह से रखे गये है। कि वो किस प्रकार की पुस्तके है। इन पुस्तकां में दो भाग है। प्रथम भाग कहलाता है। पुराना नियम और दूसरा भाग कहलाता है। नया नियम प्रभु यीशु मसीह के दिनां में इस तरह का पुराना व नया नियम नहीं था, और उस समय नया नियम लिखा भी नहीं गया था। सो प्रभु यीशु मसीह के समय जो पुस्तके थी। उन्हें केवल परमेश्वर का वचन या पवित्रशास्त्र कहा जाता था। परन्तु जब नया नियम लिखा गया और सभी पुस्तकां को एक साथ संग्रहित किया गया। तभी नये व पुराने नियम में विभाजित किया गया, पुराने नियम के पुस्तकां का जो मुख्य संदेश था। वो था, यीशु आनेवाला है, और सचमुच में यही बात वो सब कहते थे। पवित्रशास्त्र के अनुसार प्रारंभ में परमेश्वर और मनुष्य के बीच संगति थी, परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य को सृष्टि के उपर स्वतंत्रता दी थी। कि वो अपने तरफ से किसी का भी चुनाव कर सकता था। परन्तु मनुष्य ने परमेश्वर से अलग होने का चुना किया और पिता पमरेश्वर जो इस प्रकार का विद्रोह और अनाज्ञाकारिता नहीं देख सकते थे। मनुष्य से अलग हो गये। तब से परमेश्वर और मनुष्य क बीच अलगांव है और यही अलगांव की समस्या को पवित्रशास्त्र हमे बताता है। पुराने नियम परमेश्वर कहते है, कि क्या तुम मुझपर विश्वास करोंगे। जब मैं तुमको अलगांव के विषय, कुछ बताऊगा, और नये नियम में परमेश्वर कहते है। कि क्या तुम, मुझपर विश्वास करोगें। जब मैं तुझको इस अलगांव के विषय कुछ बताऊ। कि मैंने इसके लिये कुछ कर लिया है। मित्र यहाँ पर आप देखे कि पुराना नियम कहता है। कि यीशु आने वाला है और परमेश्वर तथा उसकी सृष्टि के बीच जो अलगांव है। उसे वह मिलाना चाहता है, और नया नियम हमें यह शुभ संदेश सुनाता है। कि प्रभु यीशु आ गये है, और जब वे आ गये है, तो मनुष्य और परमेश्वर के बीच जो अलगांव था। उस अलगांव को उन्हांने दूर करके मनुष्य के साथ मेल-मिलाप करा दिया है। मरकुस रचित सुसमाचार में दो शब्द है। जो नये नियम को जोड़ते है, और वो है। यीशु आये पुराने नियम की पुस्तकें पांच विभिन्न शीर्षकों के बीच आती है, और इसमें पांच अलग-अलग प्रकार की पुस्तकें है। जिसमें पहला है। व्यवस्था की पुस्तकें और ये व्यवस्था की पुस्तकें पूर्णरूप से परमेश्वर के वचन है। इन पुस्तकां से परमेश्वर हमें ये बताते है कि क्या गलत है? और क्या सही है? इसे परमेश्वर हमें ठीक करते है और अपनी उच्च धार्मिकता को बताते है और पांच व्यवस्था की पुस्तके दस इतिहासिक पुस्तकां के साथ चलती है। ये दस इतिहासिक पुस्तके हमें बताती है। कि कुछ समय परमेश्वर के लोग इस व्यवस्था की पुस्तकां का पालन करते है और कुछ समय नहीं करते है, और जब वे उन व्यवस्थाआें को पालन करते है तो वे हमारे लिये एक नमूना बन जाते है। कि हम उनका अनुसरण करे, परन्तु जब वे अनाज्ञाकारी होते है और उनका पालन नहीं करते, तो उनका वो जीवन हमारे लिये एक चेतावानी बन जाता है। इतिहासिक पुस्तकों के बाद काव्यात्मक पुस्तकें आती है। ये काव्यात्मक पुस्तकें परमेश्वर के लोगां के लिये संदेश है। जो उन लोगां के हृदय से इन वचनां से बाते करना चाहते है। जैसे कि अयुब की पुस्तक में हम देखते है। जब परमेश्वर के लोग दुखित या पीड़ित होते है, तो यह उनके लिये परमेश्वर का संदेश है। भजनसंहिता के पुस्तक के अनुसार जब परमेश्वर के लोग परमेश्वर की अराधाना करते है, तो वह उनके लिये परमेश्वर का संदेश है। अर्थात् जो कुछ भी आपके हृदय में है। वो सब कुछ अराधना द्वारा परमेश्वर तक पहुँचना चाहिये और यहीं भजनसंहिता का संदेश है। नीति वचन के पुस्तक में परमेश्वर चाहता है। कि मनुष्य व्यवहारिक ज्ञान को प्राप्त करे सभोपदेशक की पुस्तक भी परमेश्वर के लोगां के लिये परमेश्वर का संदेश है। श्रेष्ठगीत की पुस्तक भी एक ऐसा संदेश है। जो उन लोगां को प्रेसित करती है। जब वे प्रेम करने लगते है। जिसे पढ़ने से दो प्रेमियां के प्रेम गाथा का वर्णन पता चलता है। पुराने नियम में जो दूसरा भाग है। वह है नबियों की पुस्तके ये भी दो भागां में विभाजित है। प्रथम है, भविष्यवक्ताआें की बड़ी पुस्तकें और दूसरा है। भविष्यवक्ताआें की छोटी पुस्तके, भविष्यवक्ताओं की बड़ी पुस्तके इसलिए बड़ी नहीं कि वे उच्च और वरिष्ठ किताबें है। परन्तु इसलिये कि उनके अध्याय और आयत बड़े है और छोटी पुस्तकों के छोटे है। फिर नया नियम में हमारे पास पांच प्रकार की पुस्तके है। पहला है प्रभु यीशु मसीह के जीवन सम्बन्धित चार सुसमाचार इन चारों सुसामाचार में प्रभु यीशु मसीह के जीवन को अलग-अलग तरह से प्रस्तुत किया गया है। दूसरा है, इतिहासिक पुस्तक जिसे प्रेरितां के काम कहते है। तीसरा है पौलुस की पत्रिया और चौथा है, सामान्य पत्रियां नये नियम की आधी पुस्तके पौलुस पेरित द्वारा लिखी गयी है। इसी लिए आपके पास पौलुस की पत्रिया है। फिर हमारे पास सामान्य पत्रिया है, जो अन्य लोगों द्वारा लिखी गई है। पांचवां भाग है, जिससे नया नियम समाप्त होता है। वो कहलाता है। भविष्यवाणी की पुस्तक जिसे प्रकाशितवाक्य कहते है। जो आने वाले दिनां का प्रतिक है। यदि आप इस पुस्तक की बातां को समझना चाहते है, तो आप पवित्रआत्मा की अगुवाई से इसे भली-भाँति समझ सकते है। इस पुस्तक के पहले वाक्य में लिखा है। यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य सो मित्र आज हमने देखा बाइबल में जो 66 पुस्तके है। वो इस तरह से व्यवस्थित नहीं की गई है। जिस तरह से वो लिखी गई है। परन्तु वो किस तरह के पुस्तक है। उसी के आधार पर वे बाइबल में व्यवस्थित की गई है। सो मित्र आज का समय हमरा समाप्त हो रहा है। उपस्थित होवे के लिये धन्यवाद। कृप्या कल के कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिये योजना बनाये और संसार के इस महत्वपूर्ण पुस्तक के महत्वपूर्ण अध्यन में बराबर उपस्थित होने दूसरां को भी कार्यक्रम में आमंत्रित करे। जो परमेश्वर के वचन को जानने के रूची रखते हो, प्रभु आज के वचन से आपको आशिष दे।

-ःआमिनः-

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बाईबल के प्रयोजन

प्रिय मित्र प्रेमी प्रभु यीशु के पवित्र नाम में आपको हमारा नमस्कार आज के वेद पाठशाला कार्यक्रम में आपका स्वागत है। हम आपका धन्यवाद करते है। कि आप संसार के महत्वपूर्ण पुस्तक बाइबल का अध्यन हमारे साथ कर रहे है। जिस प्रकार प्रभु यीशु ने बाइबल के विषय में प्रेरितां को बताकर उनकी समझ को खोल दिया उसी प्रकार हम चाहते है। कि बाइबल के उन 66 पुस्तकां का अध्यन करने से पहले आप कुछ सच्चाईयां को जाने जिससे आपको भी समझने में आसानी हो सके इस समय मैं कुछ सच्चाईयां को बताना चाहता हूँ। जिसे प्रभु यीशु ने प्रेरितों के समाने रखा लूका रचित सुसमाचार के 24वें अध्याय को जब हम पढ़ते है, तो वहाँ बहुत ही रोचक शब्द मिलता है। कृप्या ध्यान रहे कि हम लोग बाइबल के परिदृश के उपर विचार कर रहे है। प्रभु यीशु मसीह मुर्दो में से जी उठे चुके थे और दो मनुष्य जब इम्मायूस नाम के गांव में जा रहे थे, तो प्रभु यीशु भी उनके साथ हो लिये थे। परन्तु उनकी आंखे ऐसी बन्द कर दी गयी थी, कि वे उसे पहचान न सके। प्रभु यीशु ये जानते थे। कि वे बहुत दुःखी और उदास है। क्यांकि जिन पर वे भरोशा रखते थे। जिन पर उनकी आशायें थी। कि वो उनका मसीहा होगा उसे तो क्रूस पर चढ़ा दिया गया है। प्रभु यीशु ने उन्हें झिड़का क्योंकि वे पवित्रशास्त्र के वचनों को अच्छी से तरह नहीं जानते थे। उसने कहा तुम र्निबुद्धियों के समान हो और भविष्यवक्ता की सब बातां पर विश्वास करने में मन मती के लोग हो। क्या ये आवश्यक न था? कि मसीह ये दुःख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे। तब प्रभु ने भविष्यवक्ताआें के उपर लिखे विषयां पर और पवित्रशास्त्र में अपने उपर लिखे विषयों पर उन्हें बताया प्रभु ने कहा क्या तुम मेरे विषय में लिखी उन सभी बातों को याद नहीं करते है। जो मूसा और अन्य भविष्यवक्ताआें के द्वारा और भजनसंहिता में मिलता है। तब उसने उनके बुद्धि को खोला कि वे पविशास्त्र की बाते समझ सके। प्रभु यीशु ने पवित्रशास्त्र में जो सच्चाई प्रेरितों को बताई वाये था। कि पवित्रशास्त्रा में जो कुछ लिखा है। वो मेरे विषय में लिखा है। यूहन्ना रचित सुसमाचार के 5वें अध्याय के 39-40 पद में उसने धार्मिक अगुआें को यही बता कहीं प्रभु के इन कथनां को सुनकर धर्म के अगुवे प्रभु से वाद-विवाद करते थे। कि वह कौन है? और प्रभु उनसे कहते थे, कि तुम्हें प्रमाणां की कमी नहीं है। यदि तुम सचमुच में मुझपर विश्वास करते हो, कि मैं ही मसीहा हूँ तो आपके पास अनके प्रमाण है और उसने कई एक प्रमाणां को उनके समाने प्रस्तुत किया। जैसे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का शब्द जो प्रभु के पक्ष में था और दूसरा प्रभु यीशु के बपतिस्मे के समय का पिता परमेश्वर का शब्द फिर वहाँ पर एक और अद्भूत कार्य होते हुए भी देखा जाता है। सो अनेकां प्रमाण थे, कि प्रभु यीशु मसीह सचमुच में मसीहा थे। प्रभु ने उन धर्म के अगुआें से कहा तुम लोग तो बाइबल के ज्ञाता हो और पवित्रशास्त्र में ये ढ़ूँढ़ते हो कि तुम ही अनंत जीवन देने वालों हो परन्तु ये जान लो कि पवित्रशास्त्र में सम्पूर्ण वचन मेरी ओर से इंगित करके लिखा गया है। मित्र यहाँ पर यह कथन हमें बताता है। कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र प्रभु यीशु मसीह के विषय में लिखा गया है और यहीं सच्चाई को प्रभु यीशु ने पवित्रशास्त्र में चेलो को बताया पवित्रशास्त्र में चार मुख्य उद्देश्य है। जिसे मैं अभी आपको बताना चाहूँगा। उसमें से पहला है, कि प्रभु यीशु मसीह पवित्रशास्त्र में ऐसा प्रस्तुत किया गया है, कि वे संसार के उद्धारकर्त्ता और पापों से छुटकारा दिलाने वाले है, और पवित्रशास्त्र का प्रथम उद्देश्य यहीं है। पुराने निमय में यीशु मसीह को उद्धारकर्त्ता या छुड़ाने वाला न कहकर वह आनेवाला है, कहा गया है, और नये नियम में ये कहा गया है कि वह आ गया है। वास्तव में पवित्रशास्त्र उसके आने के ऐतिहासिक संदर्भ को हमारे लिये प्रस्तुत करता है। दूसरा उद्देश्य जो पवित्रशास्त्र प्रस्तुत करता है। वह है, छुटकारा दिलाने वाले का इतिहास मित्र यहाँ पर और भी रोचक बात है। जब हम पवित्रशास्त्र के गहराईयां को देखते है। ध्यान दे कि इन विभिन्न विषयां के लिये पवित्रशास्त्र में कितना स्थान है। मैं सोचता हूँ, कि इससे हमें पवित्रशास्त्र को समझने में और भी आसानी होगी कि कौन-सा उद्देश्य है? और कौन-सा उद्देश्य नहीं है? उदाहरण के लिये नये नियम में प्रभु यीशु के चार सुसमाचारों को ले मत्ति रचित सुसमाचार, लूका रचित सुसमाचार, मरकुस रचित सुसमाचार और यूहन्ना रचित सुसमाचार यदि आप इन चारां में पुस्तकां कुछ अध्यन जोड़ना चाहते है, तो आपको 89 संख्या में आना पड़ेगा। क्यांकि इन चारों सुसमाचारों में 89 अध्याय पाये जाते है। जिसमें से चार अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जन्म और उनके प्रथम तीस वर्ष के जीवन के विषय में बताते है। लगभग 85 अध्याय में प्रभु यीशु मसीह के अंतिम तीन वर्ष के जीवन को बताया गया है, और 27 अध्याय में प्रभु यीशु के जीवन के आखीरी सप्ताह के विषय के बताते है। इन चारों सुसमाचारों के लेखक प्रभु यीशु मसीह के जीवन को एक विशेष और महत्वपूर्ण रूप से प्रस्तुत करते है। जैसे उनका जन्म, उनका प्रथम तीन वर्ष का जीवन और उनके तीस वर्ष की सेवकाई और विशेष करके उनके जीवन के अंतिम सप्ताह तथा हमारे पापों के लिये क्रूस पर प्रभु की मृत्यु और मृतकां में से जी उठना यदि हम सम्पूर्ण सुसमाचार में प्रभु यीशु मसीह के जीवन को देखते है, तो उनके जन्म और तीस वर्ष में जीवन से अधिक उनके जीवन का अंतिम सप्ताह अधिक महत्वपूर्ण दिखता है। हमलोग बड़े दिन को अधिक महत्व देते है। परन्तु पवित्रशास्त्र इस्टर को अधिक महत्व देता है। यदि हम यूहन्ना रचित सुसमाचार के अध्यायों को देखे तो प्रायः आधे अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जन्म उनके 30 वर्ष का जीवन और उनके तीन वर्ष की सेवकाई को विषय बताते है परन्तु बाकि अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जीवन के अंतिम समयां के विषय में बताते है। यूहन्ना ने अपने सुसमाचार को दो भागां में विभाजित किया है। जैसे आधा अध्याय उसके जीवन के 30 वर्ष के और तीन वर्ष की सेवकाई के विषय बताते है। दूसरा आधा भाग केवल एक सप्ताह के विषय बताता है। इस सप्ताह को हम पवित्र सप्ताह कहते है। सो मित्र यहां पर कौन-सी बात महत्वपूर्ण है? कि प्रभु यीशु का जन्म या उनके जीवन या फिर उनका दुःख सहने का अंतिम सप्ताह उनकी मृत्यु कौन-सी बात महत्वपूर्ण है? अब्राहम लिंकन कहते है। कि प्रभु का जन्म और उनकी सेवकाई इतना महत्व नहीं रखते। दो सुसमाचारों में तो प्रभु के जन्म और उनके 30 वर्ष के जीवन के विषय कुछ भी नहीं बताया गया है। परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रभु यीशु क्यां संसार में आये। वो इसलिये आये कि बहुतो की छुड़ेती के लिये अपना प्राण दे? और वे अंतिम सप्ताह के लिये आये मेरे मित्र यदि आप पवित्रशास्त्र के विभिन्न विषयां को लेकर अलग-अलग रूप से विभाजन करे तो आप पायेगें। कि बाइबल मे कुल 1189 अध्याय पाये जाते है। उनमें से 11 अध्याय विश्व के एतिहासिक बातां का वर्णन करते है। जैसे पृथ्वी, मनुष्य, भाषा, शैतान और अन्य सबलोग तथा सृष्टि के दार्शानिक लोगों के विषय में विस्तृत रूप से बाइबल के इन प्रथम 11 अध्याय में पाये जाते है। जब आप उत्पत्ति के 12वें अध्याय में प्रवेश करेगें, तो आपको इब्राहिम नाम का एक व्यक्ति मिलेगा और इस 12वें अध्याय से लेकर बाइबल के अंत तक 1178 अध्याय पाये जाते है। जिसमें अब्राहम और उनके संतानां के विषय में लिखा गया है। सचमुच में बाइबल दो हजार वर्ष के इब्रानी इतिहास के विषय में बतती है। पवित्रशास्त्र का मुख्य उद्देश्य यह नहीं कि वो हमें सृष्टि के विषय बताये कि कैसे सृष्टि की रचना हुई परन्तु इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्यां का उद्धार और लोगों को पापों से छुटकारा दिलाना है और हमें बताता है कि उद्धार संसार में कैसे और किसके द्वारा आया? इसलिये सबसे पहले यह इब्राहिम के पास जाता है और इब्राहिम से मसीह यीशु के पास आता है और मित्र सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र का सारांश यही है। जो दो हजार वर्ष के इतिहास के विषय बताता है, और सृष्टि के विषय जो तीसरा उदाहरण है। उसका इस प्रकार से अवलोकन किया गया है। कि यदि हम पुराने और नये नियम के आकार की तुलना करे तो नये नियम में 260 अध्याय और पुराने नियम में 929 अध्याय पाये जाते है। जबकि परमेश्वर इस विषय में बहुत ही गंभीर है। क्या आप अपने मन में ऐसा न सोचते होगें कि परमेश्वर ने पुराने नियम में कुछ अधिक अध्याय दिये और नये नियम में कुछ कम दिये है, तो भी आज बहुत सारे लोग यह कहते है। कि मुझे अब पुराने नियम में केई रूची नहीं है। क्यांकि वह पुरानी बाइबल है। मुझे केवल नये नियम की आवश्यकता है, और जब हम अपने सर्वेक्षण में पुराने व नये नियम का अध्यन करेंगे तो लोग हमसे पूछेगें कृप्या हमें बताये कि नये नियम का सर्वेक्षण कब से प्रारंभ होगा। हम इससे भाग लेना चाहते है। परन्तु श्रोता मित्र मैं आपको बताना चाहता हूँ कि पुराने नियम के 929 अध्याय परमेश्वर के पवित्र शब्द है और इन वचनां से परमेश्वर हमसे बाते करना चाहते है। मैं आशा करता हूँ कि पुराना नियम आपके लिये बंद की हुई पुस्तक नहीं है। परन्तु यही वो बाते है। जिनसे प्रभु यीशु ने प्रेरितां के समझ को खोला था। पौलुस प्रेरित के अनुसार पवित्रशास्त्र का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है। कि परमेश्वर ने हमें पवित्रशास्त्र अपनी प्रेरणा से दिया है। ताकि परमेश्वर के लोग सिद्ध बने और हर एक भले कार्य के लिये तत्पर्य हो जाये। जो परमेश्वर उनसे कराना चाहता है। मेरे मित्र यहां पर हम सचमुच अपने विवक और समझ से कह सकते है कि पवित्रशास्त्र अविश्वासियों के लिये नहीं परन्तु विश्वासियां के लिये लिखा गया है और प्रत्येक स्त्री-पुरूष जो सचमुच में परमेश्वर के लोग बनना चाहते है। उनके लिये लिखा गया है। परमेश्वर पिता भी यही चाहते है कि मनुष्य उसकी महिमा करे, और पवित्रशास्त्र को जाने क्योंकि ये सभी पुस्तके सच्चाई से भरी हुई है। यूहन्ना रचित सुसमाचार में हम बाइबल के आखिरी उद्देश्य को देखते है। जिसमें अविश्वासियों को सम्बोधित किया गया है। यूहन्ना ने जब सुसमाचार लिखा उसने कहा परन्तु ये इसलिये लिखे गये है। कि आप उस पर विश्वास करे कि यीशु ही मसीह और परमेश्वर का पुत्र है, और उसपर विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाये। यूहन्ना चाहते है कि हमारे पास अनंत जीवन हो और वो ये भी चाहते है। कि हम यह जाने कि यीशु कौन है? और हमारा विश्वास कैसा है? इसलिए उन्हांने कहा कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र, मसीह है और उसके उपर विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ। पवित्रशास्त्र की इन पुस्तकां को किसने लिखा और कब लिखा और किन भाषाआें में लिखा? क्या उनके हाथ के लिखे हुए? प्रारंभिक विषय आज हमारे पास है। किसने इन पुस्तकों को हमारे लिये रचा है? हमारी भाषाआें में किसने इन पुस्तकां का अनुवाद किया। किसने इन पुस्तकों का चयन किया और पवित्रशास्त्र बाइबल में संगृहित किया। इन पुस्तकां का चयन करने के लिए किसने मनुष्य को अधिकार दिया और कब इनका चयन हुआ आज जो पवित्रशास्त्र हमारे पास है। उसे किसने संगृहित करके एक पवित्रशास्त्र का रूप दिया, और मित्र इस तरह से अनेक प्रश्न है। जिसे लोग आपको पवित्रशास्त्र के विषय पूछेंगे और यदि आपलोगां से कहेगें कि आपने पवित्रशास्त्र का सर्वेक्षण किया है, और उसके विद्यार्थी रहे है तो मैं सोचता हूँ कि लोग आपसे इन प्रश्नां का उत्तर पाने की आशा रखेगें। सो इन प्रश्नां के उत्तर देने के पहले सर्वप्रथम में आपको पवित्रशास्त्र के लेखक के विषय में कुछ बतना चाहता हूँ, किसने इसे लिखा और मैं आपको बता चुका हूँ। मित्र कि परमेश्वर ने इसे लिखा है, ईश्वरीय लेखक के विषय जब हम कहते है तो इसका क्या मतलब आप समझते है? परन्तु परमेश्वर की प्रेरणा शब्द से हम उसका उत्तर पा चुके है कि परमेश्वर ने अपनी प्रेरणा से मनुष्यों की जीवन में कार्य किया जिससे वे इस पुस्तकां को लिख सके। इसलिए सचमुच में परमेश्वर ने ही इन पुस्तकों को लिखा है। जब हम कहते है। कि पिता परमेश्वर ने इन पुस्तकों को लिखा, तो हमारे पास दो बातें है। जिसे हमे समझने की आवश्यकता है, और पहली बात है। प्रगटी करण और ये प्रगटीकरण वो है। जिसमें परमेश्वर ने सम्पूर्ण रूप से अपनी सच्चाई को पवित्रआत्मा के द्वारा मनुष्यों के सामने प्रगट किया है, और इस तरह से विभिन्न तरिकों से उसने अपनी सच्चाई को हमारे समाने प्रगट किया है। प्रेरणा शब्द हमे यह स्पष्ट करता है। कि आज के धर्म विद्ववान इसे विशेष प्रगटीकरण कहते है। पवित्रशास्त्र परमेश्वर का विशेष प्रगटीकरण है। इसका आरंभ भी है और अंत भी है। 1600 वर्षों तक परमेश्वर लोगां के जीवन में प्रगट होता रहा, जिससे वे लोग इन पुस्तकों को लिख सके। प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु के 90 वर्ष के बाद यूहन्ना ने प्रकाशितवाक्य के पुस्तक को लिखा और कहा कि यदि कोई इस भविष्यवाणी की पुस्तक की बातां में से कुछ निकाल डाले तो परमेश्वर उस जीवन की पेड़ और पवित्र नगर में से जिसकी चर्चा इस पुस्तक में है। उसका भाग निकाल देगा। यह एक अद्भूत कार्य है। इसलिए इसे विशेष प्रगटी करण कहते है। कभी-कभी मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि क्या परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मुझसे बात करता है यह प्रगट होता है और यह सच है। मित्र परमेश्वर ऐसा कर सकता है। तब फिर मन में ये प्रश्न आता है। कि इनमें से कौन-सा प्रगही करण अधिक महत्वपूर्ण है? क्यांकि मैं दोनों प्रगटी करण पर विश्वास करता हूँ और मैं यह विश्वास करता हूँ। कि व्यक्तिगत प्रगटी करण के उपर विशेष प्रगटीकरण का अधिकार नियमित बना रहता है। यदि मैं एक पास्टर हूँ और कोई आकर मुझे यह कहे कि मैं अपनी पत्नी को छोड़ रहा हूँ तब मैं उससे एक प्रश्न पूछता कि क्या वह विश्वास योग्य नहीं है और वो कहता नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है। परन्तु मैं उसे युही छोड़ना चाहता हूँ, क्यांकि मैं उसे प्रसंद नहीं करता और मैं कभी भी विवाह नहीं करूँगा, और श्रोता यदि वो मुझसे ऐसा कहता कि परमेश्वर ने मुझे ऐसा कहा है कि उसे छोड़ तब मैं अपने अधिकार में बहुत ही कठोर होकर उत्तर देता, कि परमेश्वर तुमसे ऐसी बात कह ही नहीं सकता क्यांकि इस विशेष प्रगटी करण में परमेश्वर आपको ये अनुमति नहीं देता है कि आप उसे छोड़ दों। धार्मिक अगुवे कहते है। कि विवाह का संबंध तोड़ने के लिए नहीं है। अर्थात् इसका मतलब की आप इससे अलग नहीं हो सकते है और यही बात विशेष प्रगटी करण कहता है। व्यक्तिगत प्रगटी करण कभी भी विशेष प्रगटी करण का विरोध नहीं कर सकता। मित्र मैं व्यक्तिगत प्रगटी करण पर विश्वास करता हूँ। पर मैं सोचता हूँ कि इस विषय पर कुछ विशेष चेतावनी है। जिसे हम यहाँ पर देखेगें। जब हम कहते है कि परमेश्वर ने मुझे कहा है तो इस विषय पर हमें बहुत सावधान और सचेत रहना चाहिए अनेक समय हम कहते है। कि परमेश्वर ने मुझसे कहा है, पर सचमुच में परमेश्वर ऐसे हीं कहते कभी हम अपने स्वय के अनुभव व इच्छा को परमेश्वर की इच्छा समझते है, और अंत में हम कहते है, कि परमेश्वर ने मुझसे कहा है। मुझे याद है जब हम एक कलीसिया का भवन निर्माण कर रहे थे, तो उसे निर्माण करने के लिये हमारे पास एक अच्छी योजना थी। पर जब भवन तैयार हो गया, और उसमें रंग लगाकर पोताई करने की बात हुई तब लोग उसमें सहमति नहीं हुए सबके पास अपना अलग-अलग विचार था, और उनके सुझाव अगल-अगले थे। वो कहते थे ऐसा-ऐसा रंग लगाया जायेगा तो अच्छा होगा और जब हम इस विषय पर विचार-विमर्स कर रहे थे तो एक महिला एक संध्या की आत्मिक सभा में आयी। उसके हाथ में एक बड़ी दरी थी उसने साधारण रूप के यह नहीं कहा कि यह रंग मंदिर के लिये बहुत अच्छा होगा पर उसने कहा परमेश्वर ने मुझसे कहा है कि यह रंग मंदिर के लिये बहुत अच्छा होगा। परन्तु मैंने उस पर विश्वास नहीं किया और जब लोग ऐसी बात करते है तो मैं उप पर तुरन्त विश्वास नहीं करता मैं सोचता हूँ। कि वह अपनी ही मन से ऐसा कह रही थी। मित्र इस विषय पर हमें बहुत ही सावधान रहने की आवश्यकता है। प्रगटी करण और प्रेरणा शब्द के उपर जब हम ध्यान करते है तो विशेष बात यह है कि आज संसार इस प्रकार के शब्दों पर जोर दे रहा है। जैसे कि बु़द्धवाद तर्क संगत या मानववाद जब आप मसीही बनते है। तब आप विवके हीन तर्क-विर्तक करने वाले ना समझ नहीं बनते है और यही बात मैं विश्वासियां के बीच में भिन्नता देखता है। जो सचमुच में पवित्रशास्त्र और परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते है। परन्तु जो लोग अपनी मत्ती और अपने विचार के द्वारा तर्क-विर्तक करते है। वे लोग अपने बुद्धि का अनुशरण करते है, और वे उसे ही प्रगटी करण कहते है वे कहते है। मुझे किसी दर्शन या प्रकाशन की आवश्यकता नहीं है। मेरे पास बुद्धि है। परमेश्वर हमें अपने पवित्र वचन के द्वारा यह बता देते है। कि हम सही और गलत को जान सके, और धार्मिकता के द्वारा जिससे हमें निर्देश मिलता है। वही प्रकाशन है और इसी लिए हम कहते है, कि परमेश्वर ने इन पुस्तको को लिखा है। हम ये भी कहते है कि मनुष्यां ने इन पुस्तकां को लिखा। हाँ मित्र मनुष्यां ने इन पुस्तकों को लिखा है जो मछली पकड़ने वाले मछुवे थे। जो राजा थे, जो चरवाहे थे। साधारण लोग थे। एक तो बैद्ध थे। एक नाके दार था। वे सभी प्रकार के लोग थे। यदि आप इन लोगों के विषय पढ़े जिन्हांने धर्मशास्त्र को एक साथ जोड़ा तो आपको यह मानना पड़ेगा जिससे इस प्रकार का प्रश्न उत्पन्न होगा। कि कब लोगां ने स्वर्ग में कला के कार्य को सीखा वे विभिन्न स्थानां से थे। विभिन्न उम्र के थे। और यह सत्य है पर प्रश्न बहुत अच्छा है। श्रोता मित्र यदि आप इस सच्चाई पर थोड़ा गौर करे। कि इन मनुष्यों ने इन पुस्तकों को लिखा है। तो आपको थोड़ा और खोज करना पड़ेगा। तभी आप इस विषय पर कुछ जानकारी और सच्चाई को प्राप्त कर सकते है। कि कैसे ये अद्भूत कार्य हो सके, और इस प्रकार से आप इन प्रश्नों के उत्तर को प्राप्त कर सकते है। उदाहरण के लिये पुस्तकां के चुनाव के अनुसार आप उनकी खोज करे लगभग 100 ।क् के समय जो परिसत था। वो जमनिया का परिसत कहलाता था। ये सब निश्चित थे और ये पुस्तकें सचमुच मैं तीन या 400 वर्ष पहले की एक साथ लाई गई थी। और नये नियम की पुस्तके 692 ।क् के लगभग संग्रहित करके चुन ली गई थी। और उस समय एक और परिसत था। जिसे टुलन का परिसत कहा जाता था, और वहीं पर उसे एक साथ जोड़ा गया। पुराने नियम के पुस्तकों में महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलता है। कि उसका लेखक या तो भविष्यवक्ता है या फिर शास्त्री है। और नये नियम की पुस्तकों के माप में एक स्तर देखने को मिलता है। और यह एक विधि कहलाता है जो तीन भागों में आया है, और वो 3भाग ये है। कि क्या ये पुस्तके प्रेरितों द्वारा लिखी गई है। या प्रेरितों के सहयोग द्वारा लिखी गई है। क्या इन पुस्तकां में आत्मिक बाते है। जो सचमुच में विश्वासियां को आत्मिक रूप से तृप्त करते है, और उनके आवश्यकताआें को पूरा करते है, और क्या वे इन सब पुस्तकां पर एक मत से सहमत है। नये नियम मैं ये पुस्तके बहुत ही सावधानी के साथ चुनी एवम् रची गई है। अनेक लोग एपोक रिफा पुस्तकों के विषय पूछते है। जो बाईबल के नहीं है। कुछ कलीसिया के लोग इस पर विश्वास करते है कि यह भी परमेश्वर का वचन है। एपोकरिफा की पुस्तके सन् 1546 में संशोधित की गई परन्तु जब मूल और प्रारंभिक पुस्तके चुन ली गई थी। तब इन पुस्तकां का चयन नही हुआ था और मित्र जैसे आप पवित्रशास्त्र के इतिहास के विषय अध्ययन कर रहे है तो आपको कुछ अन्य बातां पर ध्यान करना होगा कि किन-किन भाषा में पवित्रशास्त्र सर्वप्रथम लिखा गया हम जानते है, कि पुराना नियम इब्रानी भाषा में और नया नियम ग्रीक भाषा में लिखो गया। बाइबल के इतिहास के विषय जो दूसरा विषय है। वह है कि मनुष्य इसका लेखक बना आप थोड़ा ध्यान दे। कि कितना समय पहले यह पुस्तक लिखी गई प्रत्येक रूप से हमारे पास ये वास्तविक लिखे हुए वचन नहीं थे। तभी इन वचनां का अनुवाद हमारी अपनी भाषा में हुआ और वह अनुवाद पूर्णरूप से इतिहास बना अगला विषय कि जैसे हम पवित्रशास्त्र के पृष्ठभूमि को ध्यान करे तो एक और महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आता है। वह प्रेरणा आप कैसे जान सकते है? कि परमेश्वर का वचन प्रेरणा दायक वचन है। मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह ने एक बार हमशे कहा था। यदि कोई जानने की इच्छुक हो तो वो जान सकता है। प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ये प्रमाणित कर सकते है। कि बाइबल सच में परमेश्वर का वचन है। सो मित्र आज का यह सर्वेक्षण यहा समाप्त होता है। अगले कार्यक्रम में अवश्य उपस्थित होवें प्रभु आपको आशिष दें।

-ःआमिनः-

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बाइबल का अध्यन कैसे करें।

नमस्कार मित्र, आज के वेद पाठशाला के कार्य क्रर्म में हम आपका स्वागत करते है। मित्र जैसे हम संसार के सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक बाइबल का सर्वेक्षण करने जा रहे है। हमे आशा है, कि आप इसे अवश्य समझेगें। और प्रभु के महान आशिषों को अपने जीवन मे प्राप्त करेगे, हम अपने अध्यन के प्रारंभ मे है। इसलिए कृप्या आप इस प्रकार योजना बनाये। ताकि प्रत्येक अध्यन में आप हमारे साथ उपस्थित रह सके है। जैसे हम परमेश्वर के वचन का अध्यन कर रहे है। तो कृप्या दूसरों को भी इस कार्यक्रम के विषय मे अवगत कराये। ताकि हम सब मिलकर परमेश्वर के जीवित वचन का अध्यन कर सके। सबसे पहले हम यह बताना चाहते है कि पवित्रशास्त्र का अध्यन कैसे किया जाना चाहिए। और सचमुच में लोग यह जानना चाहते है मित्र की पवित्रशास्त्र का अध्यन कैसे करे पवित्रशास्त्र के इस अध्यन मे आगे बढ़ने के लिए तीन प्रकार के कदम है, जिसे हम अवलोकन, प्रतिपादन और व्यवहारिक कह सकते है। अवलोकन हमेशा प्रश्न उत्पन्न करते है। अर्थात जब आप पवित्रशास्त्र के पुस्तकों, अध्यायों और पदों मे आयेगें। तो आप ये प्रश्न पूछना चाहेगे? कि यह क्या कह रहा है। दूसरा प्रश्न जो आप पूछेगे। वह उसके अनुवाद हुए शिर्षक के उपर आप पुछेगे और इससे यह प्रश्न उत्पन्न होगा कि इसका अर्थ क्या है। और जब आप पवित्रशास्त्र के अध्यन मे आगे बढे़गे, तो उसे अपने जीवन मे लागू करने के लिए तीसरा प्रश्न आप जो पूछेगे। ओ है, मेरे लिए इसका क्या अर्थ है। मित्र, यह बहुत रोचत है, कि अवलोकन क्या कहता है। मुझे याद है, एक व्यक्ति के विषय मे जो कई वर्ष पहले पवित्रशास्त्र के अध्यन मे अनेक संदेर्भो को लेकर आया करते थे। और मैं उनसे कभी-कभी यह पूछता था, कि इसका क्या अर्थ हो सकता है। और वह बुजुर्ग व्यक्ति यह कहते थे, कि मैं इसका अर्थ समझ गया हूँ। मित्र, वो प्रत्येक अध्यन मे सभी पदों को गम्भीरता के साथ अवलोकन करत थे। जब आप एक बार प्रश्न का उत्तर पा जाते है। तो आपको उसका अर्थ जानने के लिए कोई कठिनाई नही होगी। हमारे इस अध्यन मे जिस महत्वपूर्ण प्रश्न का हम का अध्यन करने जा रहे है। वो है, तीसरा प्रश्न की मेरे जीवन के लिए इसका क्या अर्थ है। यह अध्यन कोई स्वेच्छिक अध्यन नही है। और नही हम इस अध्यन से आपको पवित्रशास्त्र का विद्ववान बनाना चाहते है। परन्तु इस अध्यन से हमारा दर्शन यह है कि पवित्रशास्त्र को पढ़कर और समझकर अपने दिन प्रतिदिन की जीवन मे परमेश्वर की इच्छा को जान सके। और परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन मे लागू कर सके। मेरे श्रोता मित्र, जब आप इस अवलोकन के भाग मे आते है। तो आप को स्वयं से इस प्रकार प्रश्न पूछने की आवश्यकता है। कि क्या यहा कोई उदाहरण है, या नमूना है। जिसका अनुसरण करना है। या कोई चेतावनी है। जिससे सावधान रहना है, या फिर कोई आज्ञा है। जिसका पालन करना है। यह कोई ऐसा पाप है, जिसे छोड़ना है, क्या यहा परमेश्वर या प्रभु यीशु मसीह के विषय कोई नई सच्चाई है। या मेरे जीवन मे लिए कोई नई सच्चाई है। क्या यहा ऐसा कोई शब्द है, जो प्रेरणादायक, चुनौतीपूर्ण और शान्ति देने वाला है। या फिर का ऐसा कोई प्रश्न है। जिसका मैं उत्तर नही दे सकता हूँ। क्या उस वचन से सम्बन्धीत कोई और वचन है जो आपको प्रश्न के उत्तर पाने में सहायक हो मेरे मित्र, हमारे इस बाइबल अध्यन के लिए कुछ नियम है। जिसे जानना बहुत आवश्यक है। जिसमे पहला यह है, कि जब आप पवित्रशास्त्र का अध्यन करते है। तो यह घ्यान मे रखे की जीवन में किसी बात का लागू करना व्याख्या करने से बहुत अंतर है। जैसे व्याख्या करना एक है। परन्तु उसी वचन को जीवन मे लागू करना हजारों हो सकते है। अर्थात पवित्र आत्मा विभिन्न रीति से परमेश्वर के वचन को आपके जीवन मे लागू कर सकता है। जैसे बाइबल वह पुस्तक है। जिसका सम्पूर्ण सारांश मसीह यीशु के विषय मे लिखा है। सो मित्र जब आप बाइबल पढ़ते है, तो मसीह का हर समय सामने रखकर पढ़े? जब आप पुराने नियम का अध्यन करते है, तो ध्यान रहे आपका उदाहरण नमूना और चेतावनी के विषय में देख रहे है। पुराने नियम के प्रथम 17 पुस्तके इतिहासिक पुस्तक है। जिसमे व्यवस्था व भविष्यवक्ता की पुस्तक में बहुत सारे ऐतिहासिक बाते है। और जब आप इन ऐतिहासिक पुस्तकों को देखते है, तो आप उदाहरण नमूना और चेतावनी के विषय मे देख रहे है। उदाहरण के लिए जैसे गालातियों की पत्री उसका 4 अध्याय 22 से 24 पद को यदि हम देखे तो, यहा पौलुस प्रेरित कहते है, कि इब्राहिम के दो पुत्र हुए एक दासी से एक स्वतंत्र स्त्री से एक का नाम इस्माइल और दूसरे का नाम इसहाक था, सो इस इतिहासिक सच्चाई मे कोई संदेह नही है। इस्माइल अरबियों को और इसहाक यहूदियों का पिता ठहरे यही है। इतिहास और जब भी आप इन इतिहासिक पुस्तको को पढ़ते है। ध्यान रखे मित्र, कि वहाँ उदाहरण नमूना व चेतावनी पाये जाते है। पवित्रशास्त्र अध्यन के लिए अगला नियम है, कि हमेसा रहस्यमय और अस्पष्ट पद हम समझ मे नही आते और अधिकांश पद बहुत कठिन होते है। इसलिए हमे परमेश्वर के वचन का अध्यन गम्भीरता व प्रार्थना पूर्वक करना चाहिए। ताकि पवित्र आत्मा हमे सभी रहस्यमय बातो को समझा सके। इस अध्यन के लिए अगला नियम है कि कभी भी वचन मे यह कहकर नहीं आये कि मुझे पहले से मालूम है। एक बार एक महिला समस्याओं से घिरी हुई थी। एक पास्टर होने के नाते मैंने उसे पवित्रशास्त्र के कुछ पदो को बताया परन्तु उसने मुझे उत्तर दिया पास्टर जी कृप्या मुझे उलझन मे और न डाले, मैं इन्हे जानती हूँ। मित्र, कुछ लोग वचन मे इस प्रकार आते है। कि उनके मन और मनोबल पहले से तैयार रहते है। यह परमेश्वर के लिए भी कठिन है कि ऐसे लोगों को वचन से समझाये, क्योकि ये वचन पर विश्वास नही करते अगला महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप वचन के सिखते है। सो इसके पहले की आप किसी और को सिखाये आप उस पद के अर्थ को समझे एवं स्वेक्षा से उनका पालन भी करे। और विशेष बात यह है, कि परमेश्वर पिता अपने वचन द्वारा हमसे बाते करते है। सो जब भी आप परमेश्वर के वचन के समीप जाते है। या उसका अध्यन करते है। तो परमेश्वर पिता से माँगे की वह पवित्र आत्मा के द्वारा गुण बातों को आपके सामने प्रकट करे। और आप उनको समझ सको। भजनकार दाऊद अपने भजन मे इस तरह से कहते है, कि हे परमेश्वर मेरी आँखे खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भूत बाते देख सकु। और इसी तरह से आप परमेश्वर के वचन मे आ सकते है। एक बाइबल विद्ववान के जैसे नही परन्तु अपने मन और हृदय को खोल दे, ताकि परमेश्वर आपसे बातचीत कर सके। और परमेश्वर से दाऊद के समान एक प्रार्थना करे की प्रभु मेरी आँखां को खोल दे ताकि जो सच्चाई अपने मेरे लिये आपने वचन के रखी है। उसे मैं देख सकू मेरे श्रोता मित्र, परमेश्वर के वचन मे पहुँचने का यह एक अच्छा तरीका है। सो आप जब भी वचन पढ़ते है। प्रभु से अवश्य प्रार्थना करे, पवित्रशास्त्र पढ़ते-पढ़ते कभी-कभी ऐसे पद सामने आते है। जिन्हे हम नही समझ सकते जैसे 1 पतरस उसका 3 अध्याय 19 पद पिछले दिनों मे मैने एकटीका को देखा ताकि इस पद को समझ सकू। परन्तु टिकाकार ने लिखा है कि इस पद के विषय कोई नही जान सकते। सो मेरे मित्र, पवित्रशास्त्र मे इस प्रकार के पद है। पर आप उसके लिए निराश न ही आप अपना अध्यन जारी रखे व्यवस्था विवरण के 29ः29 पद मे लिखा है। गुप्त बाते हमारे परमेश्वर यहोवा के बस मे है। परन्तु जो प्रकट की गई है। वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के वश मे रहेगी। इसलिए की इस व्यवस्था की सब बाते पूरी की जाये। किसी ने मार्ग तवाइन से कहा मुझे बाइबल पसंद नही है। क्योकि अनेक पद है। जिसे मैं नही समझ सकता। परन्तु मार्ग तबाइन ने कहा, कि मुझे उन पदो के लिए कोई चिंता नही जिन्हे मैं नही समझता। परन्तु मुझे उन पदों की चिंता है। जिन्हे मैं पढ़कर समझ गया हूँ। सो मित्र, गुप्त बाते परमेश्वर के वस मे है। जिन्हे वह किसी भी को नही बताना चाहते परन्तु कुछ और बाते है। जिसे परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से बतया है कि हम उसका अनुसरण करे उन वचनों को पालन करे। और परमेश्वर के आज्ञा को माने। सो उन गुप्त बातों के लिए आपका विश्वास असंतुलित न हो क्योकि वो परमेश्वर के वंश मे है। पवित्रशास्त्र के कोई भी वचन किसी मनुष्य के विचार धारा के आधार पे पूर्ण नही हुई। परन्तु भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर के ओर से बोलते थे। मित्र पवित्रशास्त्र ही हमारे लिए एक अच्छा टिका है। आप वचन को समझने के लिए सब प्रकार के आत्मिक औजार को ले सकते है। परन्तु बाइबल रखना न भूले मित्र, अगला महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जो विशेष करके पुराने नियम को पढ़ने के समय सहायक सिद्ध होते हे। अर्थात जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते है। और उसके सच्चाईयां को देखते है। तो बीना किसी संदेह के आप उस पर विश्वास करते है। परन्तु जब कई लोग योना के पुस्तक मे आते है, तो वे विचार करने लगते है कि क्या मगरमछ मनुष्य को निगल सकता है। और अनेक लोग इस पर बहस करते है। और कहते है, ऐसा नही हो सकता है। पर श्रोता मित्र, मैं आपको बताना चाहता हूँ, कि इस योना की पुस्तक मे एक हमारे लिए एक महान सच्चाई है। जब हम अपने अध्यन मे इस पुस्तक पर आयेगे। तब मैं उन सच्चाईयां को आपके सामने लाऊँगा। जिन्हे परमेश्वर हमे इस पुस्तक के द्वारा सिखाना चाहते है। सो जब भी आप योना की पुस्तक पढ़ते है। आदम और हब्बा के विषय या फिर पुराने नियम के किसी भी घटना को पढ़ते है, तो आप इस प्रश्न मे आये, कि यह क्या कहता है। इसका क्या अर्थ है। और विशेष करके मेरे जीवन के लिए इसका क्या तात्पर्य है। आप स्वयं परमेश्वर से पूछे की परमेश्वर पिता आप अपने पवित्र वचन के द्वारा कौन सी सच्चाई मुझे दिखना चाहते है। भजनसंहिता 119 के 160 पद मे पवित्रशास्त्र के विषय इस प्रकार लिखा है, कि तेरा सारा वचन सत्य ही है। हा मित्र मेरे लिए यह वचन ऐसा कहता है, कि जब तुम पवित्रशास्त्र मे आकर उसकी सच्चाई को देखते हो उन सच्चाईयों की खोज करो अर्थात दूसरे शब्दों मे उसको पाने के लिए एक बड़ा संकल्प करो। और उस महान सच्चाई को प्रारंभ से प्राप्त करलो की परमेश्वर उस विषय मे क्या कहता है। और उसका सम्पूर्ण सारांश क्या है। और उसी तरह से हम बाइबल के अन्य पुस्तको मे आये विशेष करके नये नियम में आकर ये देखे कि उस विषय का सार क्या है। और जैसे रोमियों पत्री और इब्रानियों की पत्रियां मे इस प्रकार के खुलासा है। जो प्रायः बाइबल के सम्पूर्ण पुस्तको मे होकर चलते है। इन पत्रियो के प्रारंभ से अंत तक के अध्यायों मे दूसरे पुस्तकों का भी वर्णन पाया जाता है। 13वी शताब्दी तक अध्याय एवं पद नही आये थे। कैथलिक कलीसिया के प्रधान जिन्हे कारो कहते थे। उन्होने बाइबल के अध्ययों का विभाजन किया। फिर 13वीं शताब्दी मैं अध्यायो से पद का विभाजन हुआ। जैसे हम आज पद और अध्याये कह सकते है। पौलुस प्रेरित अपने पत्रियों मे कभी नही सुने थे। कि पहला 1कुरिन्थियों 10ः13 पद क्योकि जब उन्होंने अपनी पत्रिया लिखी थी तो वे नही जानते थे कि आने वाले दिनों मे अध्यायों और पदो मे ये बाट दिये जायेगे। मेरे मित्र, अक्सर ये अध्याये एवं पद हमारे अध्यन और ममन के लिए बहुत लाभप्रद होते है। परन्तु कभी-कभी ये हमारे विचारो को बहका देते है। और पुस्तकों का लेखक जो कहना चाहते है। उस सच्चाई से हम बाहर चले जाते है। इसलिए जब भी आप पवित्रशास्त्र का अध्यन करते है। उस पद के आगे व पिछे देखे और उसके संदर्भ को देखे की वचन उसमे क्या कर रहा है। कभी-कभी उदाहरण देते समय या वचन बताते समय हम वचन की सच्चाई से बाहर चले जाते है। और वचन के एक ही भाग पर प्रकाश डालते है। जिससे उस वचन को दूसरे रूप से समझ जाते है। परन्तु आप इस बात पर ध्यान रखे की जिस वचन पर आप ममन कर रहे है। उसका संदर्भ क्या कह रहा है। हर समय आप अपने मूल पाठ और संदर्भ में बने रहे और विशेष करके ये ध्यान मे रहे की पवित्रशास्त्र वो पुस्तक है। जिसके द्वारा परमेश्वर पिता हमसे बाते करता है। इसके पहले की आप पवित्रशास्त्र को पढ़े और उस पर मनन करे प्रार्थना पूर्वक वचन के पास आये प्रभु से आत्मिक ज्ञान माँगे तभी आप भली-भाति वचन के संदर्भ को समझ सकते है। जिस तरह शमूएल ने परमेश्वर पिता से कहा हे प्रभु तेरा दास सुन रहा है। अर्थात जो कुछ आप कहेगे। उसे सुनने के लिए मैं तैयार हूँ? या थोमा की तरह प्रार्थना के समय वचन को खोले और प्रभु से ऐसे प्रार्थना करे कि प्रभु सभी वो व्यर्थ आवाज बंद हो जाये, केवल आप ही प्रभु परमेश्वर है। प्रभु आप मुझसे बाते करे। मेरे मित्र इस संसार में अनेक प्रकार के आवाज है, जो हमारे कानों मे सुनाई पढ़ते है। और हमारे मनन को भंग कर देते है। इसलिए वचन के द्वारा प्रभु यीशु मसीह की मधुर आवाज के सुनने के लिए और प्रभु के साथ संगती करने के लिए इस प्रकार के प्रार्थना करने की आवश्यकता है। कि हे प्रभु सब प्रकार के व्यर्थ आवाज के मेरी कान से दूर कर दे और केवल प्रभु तू ही अपने वचन के द्वारा मुझसे बाते कर मेरे श्रोता मित्र, ये सब प्रकार की वृतान्त जो मैं आपको बता रहा हूँ जिससे आप बाइबल को अच्छी तरह से समझ सकते है। और प्रभु से मेरी प्रार्थना है। क्या आप परमेश्वर के वचन को अच्छी तरह से जान सकेंगे। एवं आत्मिक आशिष भी प्राप्त कर सकेगे। सो अभी तक हमने आपको पवित्रशास्त्र के भूमिका और प्रस्तावना के विषय बताया है। कि पवित्रशास्त्र क्या है। इसका कैसे अध्यन किया जाता है। और हम इस संसार के महत्वपूर्ण पुस्तक का अध्यन कैसे कर सकते है। यदि आप पिछले कार्यक्रम के किसी अध्यन को नही सुन पाये है। तो कृप्या आप हमसे सपर्क करे इस विषय पर बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका की माँग करे। हम आपकी सहायता करेगे। श्रोता अब मैं चाहत हूँ, कि हम पवित्रशास्त्र के पहली पुस्तक का अध्यन करे? जिसे उत्पति नाम से जाना जाता है। यह उत्पति की पुस्तक वो आदी पुस्तक है। जो सृष्टि के विषय को बताती है। और इस उत्पति शब्द का अर्थ प्रारंभ पवित्रशास्त्र मे परमेश्वर पिता ने क्यो प्रारंभिक बातो को बताया और कैसे संसार मे सभी वस्तुओं की उत्पति हुई इस उत्पति के पुस्तक मे परमेश्वर पिता हमे बहुत सारी वस्तुए के विषय बताये है, ताकि हम उसे जाने की वो क्या है। और मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह ने इस पुस्तक के विषय हमे एक कूँजी दी है। मत्ति रचित सुसमाचार के 19वें अध्याय में लोगो ने यीशु मसीह के पास आकर उनसे विवाह के विषय प्रश्न पूछने लगे। और जब उन्हे विवाह के विषय प्रश्न पूछा तब प्रभु यीशु ने उसे उत्तर दिया, कि यदि आप विवाह के विषय जानना चाहते हो? तो आरंभ की बातों मे जाकर देखां जिसमें विवाह के विषय बताया गया है। आप उत्पति की पुस्तक और मूसा की पुस्तको के पढ़ों की कैसे परमेश्वर ने मनुष्य के नर और नारी करके बनाया। कैसे उन्हे जोड़ा तब आप विवाह के विषय को समझ सकते हो। सो मित्र, मेरे लिए यह उत्पति की पुस्तक एक कूँजी की तरह है। मैं विश्वास करता हूँ, की इस पुस्तक के द्वारा हम इसके संदर्भ को जान सकेगे। इस पुस्तक मे एक विषय से दूसरे विषय के उपर वर्णन किया गया है। और श्रोता जैसे आप उत्पति के पुस्तक के प्रत्येक विषयों पर आते है। तो परमेश्वर से ये प्रश्न पूछे की प्रभु कैसे आप इस विषय पर वर्णन किये है। जो पहले था इसलिए प्रभु मे आपकी प्रसंशा करता हूँ। मेरे मित्र, इस उत्पति के पुस्तक मे सर्व प्रथम परमेश्वर सृष्टि के विषय बताते है ताकि हम इस बात को जान सके कि पहले कैसा था। और कैसे सृष्टि हुई और जैसे हमने प्रारंभ मे आपको बताया था कि बाइबल मे कुल 1189 अध्याये है। जिसने से डेढ़ अध्याये सृष्टि के विषय बताये है। और यदि आप इस विषय पर विचार करते है। और इसे जानने में रूची रखते है। तो ये जान ले की पवित्रशास्त्र इस सृष्टि के विषय विस्तृत रूप से बताता है। पर क्यो परमेश्वर वचन मे विस्तृत रूप से सृष्टि के विषय बताये है। श्रोता इस पुस्तक मे परमेश्वर पिता सृष्टि के विषय इसलिए बताते है। क्योकि वे इसे जानते थे। और मैं भी इस विषय पर विश्वास करता हूँ। जैसे दाऊद के इस कथन को पढ़कर पता चलता है। यदि हम भजनसंहिता 51ः10 पद को पढ़े तो दाऊद कहते है। हे परमेश्वर मेरे अंदर शुद्ध मन उत्पन्न कर और मेरे भितर शुद्ध आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर। अर्थात उनके इस प्रार्थना का अर्थ यह था, कि परमेश्वर मेरे हृदय में नई सृष्टि कर एक शुद्ध मन उत्पन्न कर यदि आप मेरे अंदर कुछ नया उत्पन्न नही करते है, तो वो मेरे अंदर नही होगा। और प्रभु मैं बार-बार असफल हो जाऊँगा। इसलिए हे परमेश्वर मेरे अंदर कुछ नया चिज उत्पन्न कर जब प्रभु यीशु मसीह नये जन्म के विषय बता रहे थे, तो उन्होने कहा तुम्हे नये सिरे से जन्म लेना आवश्य है। क्योकि जो शरीर से जन्मा है। वह शरीर है, जो आत्मा से जन्मा है। वह आत्मा है। जब प्रेरितों ने इस नये जन्म के उपर विश्वास किया और उसमे समर्पित हुये? तो उस अनुभव को वे नई सृष्टि कहने लगे अर्थात उन्होंने कहा यदि कोई मसीह यीशु मे है। तो वह नई सृष्टि है। पुरानी बाते बीत गई देखों सब नई हो गई। जिन लोगों को नया जन्म हुआ है। परमेश्वर उनकी हृदय मे एक नई सृष्टि के कार्य किये है। और मित्र यही है। सृष्टि का अर्थ और यदि हम उस सृष्टि के कार्य को अपने हृदय मे होते हुये देखना चाहते है, तो हमे इसके लिए परमेश्वर के पास जाना होगा। फिर उत्पति के तीसरे अध्याय मे परमेश्वर पिता पाप के विषय में बताये है। फिर चौथे अध्याय मे आप पाप के घोर विरोध को देख सकते है। कैन और हाविल के बीच जो विरोध उत्पन्न हुआ। उस विरोध को आप देख सकते है। और आज भी हम उसी विरोध को यहाँ पर देखते है। मेरे मित्र, उसके बाद हम उत्पति के 6वें अध्याय से 10वें अध्याय में परमेश्वर के महा विपति के विषय मे पाते है। ताकि आज जो महान विपतिया है। उसे हम उसी तरह से समझ सके। परमेश्वर ने सम्पूर्ण संसार को जल प्रलय से नाश कर दिया। फिर उत्पति के 11वें अध्याय मे हम मनुष्य के भाषाओं मे गड़बड़ी पड़ने का वर्णन पाते है। जब हम उत्पति के 12वें अध्याय को देखते है। वहा पर हमे तीन लोगों की जीवन को देखने को मिलता है। पहला है अब्राहम, याकूब, यूशूफ, परमेश्वर पिता अपने पवित्रशास्त्र में इन लोगों के जीवन से हमे कुछ महान बातों को सिखना चाहते है। अब्राहम के जीवन से विश्वास की बाते याकूब के जीवन से एकात्माता की बाते और यूसूफ के जीवन से ये बताना चाहते है, कि परमेश्वर पिता सर्वश्रेष्ठ और परम प्रधान है। सो मित्र, यही है उत्पति के पुस्तक का सारांश इसलिए जब भी आप इस पुस्तक को आप पढ़ते है। उन सारे बातों पर ध्यान रखे और अपने आप से प्रश्न पूछे की इस विषय द्वारा परमेश्वर आपसे क्या बाते करना चाहता है। सो मित्र अब हमने अपने बाइबल अध्यन को प्रारंभ कर लिया है। मैं चाहत हूँ, कि आप तीन कार्य करे। पहला कभी भी इस कार्यक्रम को सुनना न भुले दूसरा अपने मित्र और पड़ोसियों को इसके बारे में अवश्य अवगत कराये? कि वे भी उसे सुन सके। और तीसरा की यदि आप अभी तक उत्पति के पुस्तक को पढ़ना प्रारंभ नही किये है। तो कृप्या अवश्य इसे पढ़े अपने से प्रश्न पूछे की इसका क्या अर्थ है। और मेरे लिए ये क्या कह रहा है। और परमेश्वर इसके द्वारा मुझसे क्या बाते करना चाहता है। प्रभु आज के वचन के द्वारा आपकों आशिष दे। आपकी सहायता करे आइये हम प्रभु से प्रार्थना करे हमारे स्वर्गीय पिता परमेश्वर आज के सुन्दर वचन के लिए हम आपका धन्यवाद करते है। प्रभु प्रार्थना करते है। हमारे मित्रों के लिए यदि कोई बीमार है। प्रभु आप उन्हे छुये उन्हेचंगाई प्रदान करे। यदि कोई किसी प्रकार के पाप मे फंसे है। प्रभु आप उनकी सहायता करे, कि वो पाप को छोड़कर आपके मार्ग मे चलने वाले हो सके। प्रभु यीशु मसीह के नाम से प्रार्थना माँगते है। -ःआमिनः-