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बाइबल का अध्यन कैसे करें।

नमस्कार मित्र, आज के वेद पाठशाला के कार्य क्रर्म में हम आपका स्वागत करते है। मित्र जैसे हम संसार के सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक बाइबल का सर्वेक्षण करने जा रहे है। हमे आशा है, कि आप इसे अवश्य समझेगें। और प्रभु के महान आशिषों को अपने जीवन मे प्राप्त करेगे, हम अपने अध्यन के प्रारंभ मे है। इसलिए कृप्या आप इस प्रकार योजना बनाये। ताकि प्रत्येक अध्यन में आप हमारे साथ उपस्थित रह सके है। जैसे हम परमेश्वर के वचन का अध्यन कर रहे है। तो कृप्या दूसरों को भी इस कार्यक्रम के विषय मे अवगत कराये। ताकि हम सब मिलकर परमेश्वर के जीवित वचन का अध्यन कर सके। सबसे पहले हम यह बताना चाहते है कि पवित्रशास्त्र का अध्यन कैसे किया जाना चाहिए। और सचमुच में लोग यह जानना चाहते है मित्र की पवित्रशास्त्र का अध्यन कैसे करे पवित्रशास्त्र के इस अध्यन मे आगे बढ़ने के लिए तीन प्रकार के कदम है, जिसे हम अवलोकन, प्रतिपादन और व्यवहारिक कह सकते है। अवलोकन हमेशा प्रश्न उत्पन्न करते है। अर्थात जब आप पवित्रशास्त्र के पुस्तकों, अध्यायों और पदों मे आयेगें। तो आप ये प्रश्न पूछना चाहेगे? कि यह क्या कह रहा है। दूसरा प्रश्न जो आप पूछेगे। वह उसके अनुवाद हुए शिर्षक के उपर आप पुछेगे और इससे यह प्रश्न उत्पन्न होगा कि इसका अर्थ क्या है। और जब आप पवित्रशास्त्र के अध्यन मे आगे बढे़गे, तो उसे अपने जीवन मे लागू करने के लिए तीसरा प्रश्न आप जो पूछेगे। ओ है, मेरे लिए इसका क्या अर्थ है। मित्र, यह बहुत रोचत है, कि अवलोकन क्या कहता है। मुझे याद है, एक व्यक्ति के विषय मे जो कई वर्ष पहले पवित्रशास्त्र के अध्यन मे अनेक संदेर्भो को लेकर आया करते थे। और मैं उनसे कभी-कभी यह पूछता था, कि इसका क्या अर्थ हो सकता है। और वह बुजुर्ग व्यक्ति यह कहते थे, कि मैं इसका अर्थ समझ गया हूँ। मित्र, वो प्रत्येक अध्यन मे सभी पदों को गम्भीरता के साथ अवलोकन करत थे। जब आप एक बार प्रश्न का उत्तर पा जाते है। तो आपको उसका अर्थ जानने के लिए कोई कठिनाई नही होगी। हमारे इस अध्यन मे जिस महत्वपूर्ण प्रश्न का हम का अध्यन करने जा रहे है। वो है, तीसरा प्रश्न की मेरे जीवन के लिए इसका क्या अर्थ है। यह अध्यन कोई स्वेच्छिक अध्यन नही है। और नही हम इस अध्यन से आपको पवित्रशास्त्र का विद्ववान बनाना चाहते है। परन्तु इस अध्यन से हमारा दर्शन यह है कि पवित्रशास्त्र को पढ़कर और समझकर अपने दिन प्रतिदिन की जीवन मे परमेश्वर की इच्छा को जान सके। और परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन मे लागू कर सके। मेरे श्रोता मित्र, जब आप इस अवलोकन के भाग मे आते है। तो आप को स्वयं से इस प्रकार प्रश्न पूछने की आवश्यकता है। कि क्या यहा कोई उदाहरण है, या नमूना है। जिसका अनुसरण करना है। या कोई चेतावनी है। जिससे सावधान रहना है, या फिर कोई आज्ञा है। जिसका पालन करना है। यह कोई ऐसा पाप है, जिसे छोड़ना है, क्या यहा परमेश्वर या प्रभु यीशु मसीह के विषय कोई नई सच्चाई है। या मेरे जीवन मे लिए कोई नई सच्चाई है। क्या यहा ऐसा कोई शब्द है, जो प्रेरणादायक, चुनौतीपूर्ण और शान्ति देने वाला है। या फिर का ऐसा कोई प्रश्न है। जिसका मैं उत्तर नही दे सकता हूँ। क्या उस वचन से सम्बन्धीत कोई और वचन है जो आपको प्रश्न के उत्तर पाने में सहायक हो मेरे मित्र, हमारे इस बाइबल अध्यन के लिए कुछ नियम है। जिसे जानना बहुत आवश्यक है। जिसमे पहला यह है, कि जब आप पवित्रशास्त्र का अध्यन करते है। तो यह घ्यान मे रखे की जीवन में किसी बात का लागू करना व्याख्या करने से बहुत अंतर है। जैसे व्याख्या करना एक है। परन्तु उसी वचन को जीवन मे लागू करना हजारों हो सकते है। अर्थात पवित्र आत्मा विभिन्न रीति से परमेश्वर के वचन को आपके जीवन मे लागू कर सकता है। जैसे बाइबल वह पुस्तक है। जिसका सम्पूर्ण सारांश मसीह यीशु के विषय मे लिखा है। सो मित्र जब आप बाइबल पढ़ते है, तो मसीह का हर समय सामने रखकर पढ़े? जब आप पुराने नियम का अध्यन करते है, तो ध्यान रहे आपका उदाहरण नमूना और चेतावनी के विषय में देख रहे है। पुराने नियम के प्रथम 17 पुस्तके इतिहासिक पुस्तक है। जिसमे व्यवस्था व भविष्यवक्ता की पुस्तक में बहुत सारे ऐतिहासिक बाते है। और जब आप इन ऐतिहासिक पुस्तकों को देखते है, तो आप उदाहरण नमूना और चेतावनी के विषय मे देख रहे है। उदाहरण के लिए जैसे गालातियों की पत्री उसका 4 अध्याय 22 से 24 पद को यदि हम देखे तो, यहा पौलुस प्रेरित कहते है, कि इब्राहिम के दो पुत्र हुए एक दासी से एक स्वतंत्र स्त्री से एक का नाम इस्माइल और दूसरे का नाम इसहाक था, सो इस इतिहासिक सच्चाई मे कोई संदेह नही है। इस्माइल अरबियों को और इसहाक यहूदियों का पिता ठहरे यही है। इतिहास और जब भी आप इन इतिहासिक पुस्तको को पढ़ते है। ध्यान रखे मित्र, कि वहाँ उदाहरण नमूना व चेतावनी पाये जाते है। पवित्रशास्त्र अध्यन के लिए अगला नियम है, कि हमेसा रहस्यमय और अस्पष्ट पद हम समझ मे नही आते और अधिकांश पद बहुत कठिन होते है। इसलिए हमे परमेश्वर के वचन का अध्यन गम्भीरता व प्रार्थना पूर्वक करना चाहिए। ताकि पवित्र आत्मा हमे सभी रहस्यमय बातो को समझा सके। इस अध्यन के लिए अगला नियम है कि कभी भी वचन मे यह कहकर नहीं आये कि मुझे पहले से मालूम है। एक बार एक महिला समस्याओं से घिरी हुई थी। एक पास्टर होने के नाते मैंने उसे पवित्रशास्त्र के कुछ पदो को बताया परन्तु उसने मुझे उत्तर दिया पास्टर जी कृप्या मुझे उलझन मे और न डाले, मैं इन्हे जानती हूँ। मित्र, कुछ लोग वचन मे इस प्रकार आते है। कि उनके मन और मनोबल पहले से तैयार रहते है। यह परमेश्वर के लिए भी कठिन है कि ऐसे लोगों को वचन से समझाये, क्योकि ये वचन पर विश्वास नही करते अगला महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप वचन के सिखते है। सो इसके पहले की आप किसी और को सिखाये आप उस पद के अर्थ को समझे एवं स्वेक्षा से उनका पालन भी करे। और विशेष बात यह है, कि परमेश्वर पिता अपने वचन द्वारा हमसे बाते करते है। सो जब भी आप परमेश्वर के वचन के समीप जाते है। या उसका अध्यन करते है। तो परमेश्वर पिता से माँगे की वह पवित्र आत्मा के द्वारा गुण बातों को आपके सामने प्रकट करे। और आप उनको समझ सको। भजनकार दाऊद अपने भजन मे इस तरह से कहते है, कि हे परमेश्वर मेरी आँखे खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भूत बाते देख सकु। और इसी तरह से आप परमेश्वर के वचन मे आ सकते है। एक बाइबल विद्ववान के जैसे नही परन्तु अपने मन और हृदय को खोल दे, ताकि परमेश्वर आपसे बातचीत कर सके। और परमेश्वर से दाऊद के समान एक प्रार्थना करे की प्रभु मेरी आँखां को खोल दे ताकि जो सच्चाई अपने मेरे लिये आपने वचन के रखी है। उसे मैं देख सकू मेरे श्रोता मित्र, परमेश्वर के वचन मे पहुँचने का यह एक अच्छा तरीका है। सो आप जब भी वचन पढ़ते है। प्रभु से अवश्य प्रार्थना करे, पवित्रशास्त्र पढ़ते-पढ़ते कभी-कभी ऐसे पद सामने आते है। जिन्हे हम नही समझ सकते जैसे 1 पतरस उसका 3 अध्याय 19 पद पिछले दिनों मे मैने एकटीका को देखा ताकि इस पद को समझ सकू। परन्तु टिकाकार ने लिखा है कि इस पद के विषय कोई नही जान सकते। सो मेरे मित्र, पवित्रशास्त्र मे इस प्रकार के पद है। पर आप उसके लिए निराश न ही आप अपना अध्यन जारी रखे व्यवस्था विवरण के 29ः29 पद मे लिखा है। गुप्त बाते हमारे परमेश्वर यहोवा के बस मे है। परन्तु जो प्रकट की गई है। वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के वश मे रहेगी। इसलिए की इस व्यवस्था की सब बाते पूरी की जाये। किसी ने मार्ग तवाइन से कहा मुझे बाइबल पसंद नही है। क्योकि अनेक पद है। जिसे मैं नही समझ सकता। परन्तु मार्ग तबाइन ने कहा, कि मुझे उन पदो के लिए कोई चिंता नही जिन्हे मैं नही समझता। परन्तु मुझे उन पदों की चिंता है। जिन्हे मैं पढ़कर समझ गया हूँ। सो मित्र, गुप्त बाते परमेश्वर के वस मे है। जिन्हे वह किसी भी को नही बताना चाहते परन्तु कुछ और बाते है। जिसे परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से बतया है कि हम उसका अनुसरण करे उन वचनों को पालन करे। और परमेश्वर के आज्ञा को माने। सो उन गुप्त बातों के लिए आपका विश्वास असंतुलित न हो क्योकि वो परमेश्वर के वंश मे है। पवित्रशास्त्र के कोई भी वचन किसी मनुष्य के विचार धारा के आधार पे पूर्ण नही हुई। परन्तु भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर के ओर से बोलते थे। मित्र पवित्रशास्त्र ही हमारे लिए एक अच्छा टिका है। आप वचन को समझने के लिए सब प्रकार के आत्मिक औजार को ले सकते है। परन्तु बाइबल रखना न भूले मित्र, अगला महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जो विशेष करके पुराने नियम को पढ़ने के समय सहायक सिद्ध होते हे। अर्थात जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते है। और उसके सच्चाईयां को देखते है। तो बीना किसी संदेह के आप उस पर विश्वास करते है। परन्तु जब कई लोग योना के पुस्तक मे आते है, तो वे विचार करने लगते है कि क्या मगरमछ मनुष्य को निगल सकता है। और अनेक लोग इस पर बहस करते है। और कहते है, ऐसा नही हो सकता है। पर श्रोता मित्र, मैं आपको बताना चाहता हूँ, कि इस योना की पुस्तक मे एक हमारे लिए एक महान सच्चाई है। जब हम अपने अध्यन मे इस पुस्तक पर आयेगे। तब मैं उन सच्चाईयां को आपके सामने लाऊँगा। जिन्हे परमेश्वर हमे इस पुस्तक के द्वारा सिखाना चाहते है। सो जब भी आप योना की पुस्तक पढ़ते है। आदम और हब्बा के विषय या फिर पुराने नियम के किसी भी घटना को पढ़ते है, तो आप इस प्रश्न मे आये, कि यह क्या कहता है। इसका क्या अर्थ है। और विशेष करके मेरे जीवन के लिए इसका क्या तात्पर्य है। आप स्वयं परमेश्वर से पूछे की परमेश्वर पिता आप अपने पवित्र वचन के द्वारा कौन सी सच्चाई मुझे दिखना चाहते है। भजनसंहिता 119 के 160 पद मे पवित्रशास्त्र के विषय इस प्रकार लिखा है, कि तेरा सारा वचन सत्य ही है। हा मित्र मेरे लिए यह वचन ऐसा कहता है, कि जब तुम पवित्रशास्त्र मे आकर उसकी सच्चाई को देखते हो उन सच्चाईयों की खोज करो अर्थात दूसरे शब्दों मे उसको पाने के लिए एक बड़ा संकल्प करो। और उस महान सच्चाई को प्रारंभ से प्राप्त करलो की परमेश्वर उस विषय मे क्या कहता है। और उसका सम्पूर्ण सारांश क्या है। और उसी तरह से हम बाइबल के अन्य पुस्तको मे आये विशेष करके नये नियम में आकर ये देखे कि उस विषय का सार क्या है। और जैसे रोमियों पत्री और इब्रानियों की पत्रियां मे इस प्रकार के खुलासा है। जो प्रायः बाइबल के सम्पूर्ण पुस्तको मे होकर चलते है। इन पत्रियो के प्रारंभ से अंत तक के अध्यायों मे दूसरे पुस्तकों का भी वर्णन पाया जाता है। 13वी शताब्दी तक अध्याय एवं पद नही आये थे। कैथलिक कलीसिया के प्रधान जिन्हे कारो कहते थे। उन्होने बाइबल के अध्ययों का विभाजन किया। फिर 13वीं शताब्दी मैं अध्यायो से पद का विभाजन हुआ। जैसे हम आज पद और अध्याये कह सकते है। पौलुस प्रेरित अपने पत्रियों मे कभी नही सुने थे। कि पहला 1कुरिन्थियों 10ः13 पद क्योकि जब उन्होंने अपनी पत्रिया लिखी थी तो वे नही जानते थे कि आने वाले दिनों मे अध्यायों और पदो मे ये बाट दिये जायेगे। मेरे मित्र, अक्सर ये अध्याये एवं पद हमारे अध्यन और ममन के लिए बहुत लाभप्रद होते है। परन्तु कभी-कभी ये हमारे विचारो को बहका देते है। और पुस्तकों का लेखक जो कहना चाहते है। उस सच्चाई से हम बाहर चले जाते है। इसलिए जब भी आप पवित्रशास्त्र का अध्यन करते है। उस पद के आगे व पिछे देखे और उसके संदर्भ को देखे की वचन उसमे क्या कर रहा है। कभी-कभी उदाहरण देते समय या वचन बताते समय हम वचन की सच्चाई से बाहर चले जाते है। और वचन के एक ही भाग पर प्रकाश डालते है। जिससे उस वचन को दूसरे रूप से समझ जाते है। परन्तु आप इस बात पर ध्यान रखे की जिस वचन पर आप ममन कर रहे है। उसका संदर्भ क्या कह रहा है। हर समय आप अपने मूल पाठ और संदर्भ में बने रहे और विशेष करके ये ध्यान मे रहे की पवित्रशास्त्र वो पुस्तक है। जिसके द्वारा परमेश्वर पिता हमसे बाते करता है। इसके पहले की आप पवित्रशास्त्र को पढ़े और उस पर मनन करे प्रार्थना पूर्वक वचन के पास आये प्रभु से आत्मिक ज्ञान माँगे तभी आप भली-भाति वचन के संदर्भ को समझ सकते है। जिस तरह शमूएल ने परमेश्वर पिता से कहा हे प्रभु तेरा दास सुन रहा है। अर्थात जो कुछ आप कहेगे। उसे सुनने के लिए मैं तैयार हूँ? या थोमा की तरह प्रार्थना के समय वचन को खोले और प्रभु से ऐसे प्रार्थना करे कि प्रभु सभी वो व्यर्थ आवाज बंद हो जाये, केवल आप ही प्रभु परमेश्वर है। प्रभु आप मुझसे बाते करे। मेरे मित्र इस संसार में अनेक प्रकार के आवाज है, जो हमारे कानों मे सुनाई पढ़ते है। और हमारे मनन को भंग कर देते है। इसलिए वचन के द्वारा प्रभु यीशु मसीह की मधुर आवाज के सुनने के लिए और प्रभु के साथ संगती करने के लिए इस प्रकार के प्रार्थना करने की आवश्यकता है। कि हे प्रभु सब प्रकार के व्यर्थ आवाज के मेरी कान से दूर कर दे और केवल प्रभु तू ही अपने वचन के द्वारा मुझसे बाते कर मेरे श्रोता मित्र, ये सब प्रकार की वृतान्त जो मैं आपको बता रहा हूँ जिससे आप बाइबल को अच्छी तरह से समझ सकते है। और प्रभु से मेरी प्रार्थना है। क्या आप परमेश्वर के वचन को अच्छी तरह से जान सकेंगे। एवं आत्मिक आशिष भी प्राप्त कर सकेगे। सो अभी तक हमने आपको पवित्रशास्त्र के भूमिका और प्रस्तावना के विषय बताया है। कि पवित्रशास्त्र क्या है। इसका कैसे अध्यन किया जाता है। और हम इस संसार के महत्वपूर्ण पुस्तक का अध्यन कैसे कर सकते है। यदि आप पिछले कार्यक्रम के किसी अध्यन को नही सुन पाये है। तो कृप्या आप हमसे सपर्क करे इस विषय पर बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका की माँग करे। हम आपकी सहायता करेगे। श्रोता अब मैं चाहत हूँ, कि हम पवित्रशास्त्र के पहली पुस्तक का अध्यन करे? जिसे उत्पति नाम से जाना जाता है। यह उत्पति की पुस्तक वो आदी पुस्तक है। जो सृष्टि के विषय को बताती है। और इस उत्पति शब्द का अर्थ प्रारंभ पवित्रशास्त्र मे परमेश्वर पिता ने क्यो प्रारंभिक बातो को बताया और कैसे संसार मे सभी वस्तुओं की उत्पति हुई इस उत्पति के पुस्तक मे परमेश्वर पिता हमे बहुत सारी वस्तुए के विषय बताये है, ताकि हम उसे जाने की वो क्या है। और मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह ने इस पुस्तक के विषय हमे एक कूँजी दी है। मत्ति रचित सुसमाचार के 19वें अध्याय में लोगो ने यीशु मसीह के पास आकर उनसे विवाह के विषय प्रश्न पूछने लगे। और जब उन्हे विवाह के विषय प्रश्न पूछा तब प्रभु यीशु ने उसे उत्तर दिया, कि यदि आप विवाह के विषय जानना चाहते हो? तो आरंभ की बातों मे जाकर देखां जिसमें विवाह के विषय बताया गया है। आप उत्पति की पुस्तक और मूसा की पुस्तको के पढ़ों की कैसे परमेश्वर ने मनुष्य के नर और नारी करके बनाया। कैसे उन्हे जोड़ा तब आप विवाह के विषय को समझ सकते हो। सो मित्र, मेरे लिए यह उत्पति की पुस्तक एक कूँजी की तरह है। मैं विश्वास करता हूँ, की इस पुस्तक के द्वारा हम इसके संदर्भ को जान सकेगे। इस पुस्तक मे एक विषय से दूसरे विषय के उपर वर्णन किया गया है। और श्रोता जैसे आप उत्पति के पुस्तक के प्रत्येक विषयों पर आते है। तो परमेश्वर से ये प्रश्न पूछे की प्रभु कैसे आप इस विषय पर वर्णन किये है। जो पहले था इसलिए प्रभु मे आपकी प्रसंशा करता हूँ। मेरे मित्र, इस उत्पति के पुस्तक मे सर्व प्रथम परमेश्वर सृष्टि के विषय बताते है ताकि हम इस बात को जान सके कि पहले कैसा था। और कैसे सृष्टि हुई और जैसे हमने प्रारंभ मे आपको बताया था कि बाइबल मे कुल 1189 अध्याये है। जिसने से डेढ़ अध्याये सृष्टि के विषय बताये है। और यदि आप इस विषय पर विचार करते है। और इसे जानने में रूची रखते है। तो ये जान ले की पवित्रशास्त्र इस सृष्टि के विषय विस्तृत रूप से बताता है। पर क्यो परमेश्वर वचन मे विस्तृत रूप से सृष्टि के विषय बताये है। श्रोता इस पुस्तक मे परमेश्वर पिता सृष्टि के विषय इसलिए बताते है। क्योकि वे इसे जानते थे। और मैं भी इस विषय पर विश्वास करता हूँ। जैसे दाऊद के इस कथन को पढ़कर पता चलता है। यदि हम भजनसंहिता 51ः10 पद को पढ़े तो दाऊद कहते है। हे परमेश्वर मेरे अंदर शुद्ध मन उत्पन्न कर और मेरे भितर शुद्ध आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर। अर्थात उनके इस प्रार्थना का अर्थ यह था, कि परमेश्वर मेरे हृदय में नई सृष्टि कर एक शुद्ध मन उत्पन्न कर यदि आप मेरे अंदर कुछ नया उत्पन्न नही करते है, तो वो मेरे अंदर नही होगा। और प्रभु मैं बार-बार असफल हो जाऊँगा। इसलिए हे परमेश्वर मेरे अंदर कुछ नया चिज उत्पन्न कर जब प्रभु यीशु मसीह नये जन्म के विषय बता रहे थे, तो उन्होने कहा तुम्हे नये सिरे से जन्म लेना आवश्य है। क्योकि जो शरीर से जन्मा है। वह शरीर है, जो आत्मा से जन्मा है। वह आत्मा है। जब प्रेरितों ने इस नये जन्म के उपर विश्वास किया और उसमे समर्पित हुये? तो उस अनुभव को वे नई सृष्टि कहने लगे अर्थात उन्होंने कहा यदि कोई मसीह यीशु मे है। तो वह नई सृष्टि है। पुरानी बाते बीत गई देखों सब नई हो गई। जिन लोगों को नया जन्म हुआ है। परमेश्वर उनकी हृदय मे एक नई सृष्टि के कार्य किये है। और मित्र यही है। सृष्टि का अर्थ और यदि हम उस सृष्टि के कार्य को अपने हृदय मे होते हुये देखना चाहते है, तो हमे इसके लिए परमेश्वर के पास जाना होगा। फिर उत्पति के तीसरे अध्याय मे परमेश्वर पिता पाप के विषय में बताये है। फिर चौथे अध्याय मे आप पाप के घोर विरोध को देख सकते है। कैन और हाविल के बीच जो विरोध उत्पन्न हुआ। उस विरोध को आप देख सकते है। और आज भी हम उसी विरोध को यहाँ पर देखते है। मेरे मित्र, उसके बाद हम उत्पति के 6वें अध्याय से 10वें अध्याय में परमेश्वर के महा विपति के विषय मे पाते है। ताकि आज जो महान विपतिया है। उसे हम उसी तरह से समझ सके। परमेश्वर ने सम्पूर्ण संसार को जल प्रलय से नाश कर दिया। फिर उत्पति के 11वें अध्याय मे हम मनुष्य के भाषाओं मे गड़बड़ी पड़ने का वर्णन पाते है। जब हम उत्पति के 12वें अध्याय को देखते है। वहा पर हमे तीन लोगों की जीवन को देखने को मिलता है। पहला है अब्राहम, याकूब, यूशूफ, परमेश्वर पिता अपने पवित्रशास्त्र में इन लोगों के जीवन से हमे कुछ महान बातों को सिखना चाहते है। अब्राहम के जीवन से विश्वास की बाते याकूब के जीवन से एकात्माता की बाते और यूसूफ के जीवन से ये बताना चाहते है, कि परमेश्वर पिता सर्वश्रेष्ठ और परम प्रधान है। सो मित्र, यही है उत्पति के पुस्तक का सारांश इसलिए जब भी आप इस पुस्तक को आप पढ़ते है। उन सारे बातों पर ध्यान रखे और अपने आप से प्रश्न पूछे की इस विषय द्वारा परमेश्वर आपसे क्या बाते करना चाहता है। सो मित्र अब हमने अपने बाइबल अध्यन को प्रारंभ कर लिया है। मैं चाहत हूँ, कि आप तीन कार्य करे। पहला कभी भी इस कार्यक्रम को सुनना न भुले दूसरा अपने मित्र और पड़ोसियों को इसके बारे में अवश्य अवगत कराये? कि वे भी उसे सुन सके। और तीसरा की यदि आप अभी तक उत्पति के पुस्तक को पढ़ना प्रारंभ नही किये है। तो कृप्या अवश्य इसे पढ़े अपने से प्रश्न पूछे की इसका क्या अर्थ है। और मेरे लिए ये क्या कह रहा है। और परमेश्वर इसके द्वारा मुझसे क्या बाते करना चाहता है। प्रभु आज के वचन के द्वारा आपकों आशिष दे। आपकी सहायता करे आइये हम प्रभु से प्रार्थना करे हमारे स्वर्गीय पिता परमेश्वर आज के सुन्दर वचन के लिए हम आपका धन्यवाद करते है। प्रभु प्रार्थना करते है। हमारे मित्रों के लिए यदि कोई बीमार है। प्रभु आप उन्हे छुये उन्हेचंगाई प्रदान करे। यदि कोई किसी प्रकार के पाप मे फंसे है। प्रभु आप उनकी सहायता करे, कि वो पाप को छोड़कर आपके मार्ग मे चलने वाले हो सके। प्रभु यीशु मसीह के नाम से प्रार्थना माँगते है। -ःआमिनः-

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