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बाईबल के प्रयोजन

प्रिय मित्र प्रेमी प्रभु यीशु के पवित्र नाम में आपको हमारा नमस्कार आज के वेद पाठशाला कार्यक्रम में आपका स्वागत है। हम आपका धन्यवाद करते है। कि आप संसार के महत्वपूर्ण पुस्तक बाइबल का अध्यन हमारे साथ कर रहे है। जिस प्रकार प्रभु यीशु ने बाइबल के विषय में प्रेरितां को बताकर उनकी समझ को खोल दिया उसी प्रकार हम चाहते है। कि बाइबल के उन 66 पुस्तकां का अध्यन करने से पहले आप कुछ सच्चाईयां को जाने जिससे आपको भी समझने में आसानी हो सके इस समय मैं कुछ सच्चाईयां को बताना चाहता हूँ। जिसे प्रभु यीशु ने प्रेरितों के समाने रखा लूका रचित सुसमाचार के 24वें अध्याय को जब हम पढ़ते है, तो वहाँ बहुत ही रोचक शब्द मिलता है। कृप्या ध्यान रहे कि हम लोग बाइबल के परिदृश के उपर विचार कर रहे है। प्रभु यीशु मसीह मुर्दो में से जी उठे चुके थे और दो मनुष्य जब इम्मायूस नाम के गांव में जा रहे थे, तो प्रभु यीशु भी उनके साथ हो लिये थे। परन्तु उनकी आंखे ऐसी बन्द कर दी गयी थी, कि वे उसे पहचान न सके। प्रभु यीशु ये जानते थे। कि वे बहुत दुःखी और उदास है। क्यांकि जिन पर वे भरोशा रखते थे। जिन पर उनकी आशायें थी। कि वो उनका मसीहा होगा उसे तो क्रूस पर चढ़ा दिया गया है। प्रभु यीशु ने उन्हें झिड़का क्योंकि वे पवित्रशास्त्र के वचनों को अच्छी से तरह नहीं जानते थे। उसने कहा तुम र्निबुद्धियों के समान हो और भविष्यवक्ता की सब बातां पर विश्वास करने में मन मती के लोग हो। क्या ये आवश्यक न था? कि मसीह ये दुःख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे। तब प्रभु ने भविष्यवक्ताआें के उपर लिखे विषयां पर और पवित्रशास्त्र में अपने उपर लिखे विषयों पर उन्हें बताया प्रभु ने कहा क्या तुम मेरे विषय में लिखी उन सभी बातों को याद नहीं करते है। जो मूसा और अन्य भविष्यवक्ताआें के द्वारा और भजनसंहिता में मिलता है। तब उसने उनके बुद्धि को खोला कि वे पविशास्त्र की बाते समझ सके। प्रभु यीशु ने पवित्रशास्त्र में जो सच्चाई प्रेरितों को बताई वाये था। कि पवित्रशास्त्रा में जो कुछ लिखा है। वो मेरे विषय में लिखा है। यूहन्ना रचित सुसमाचार के 5वें अध्याय के 39-40 पद में उसने धार्मिक अगुआें को यही बता कहीं प्रभु के इन कथनां को सुनकर धर्म के अगुवे प्रभु से वाद-विवाद करते थे। कि वह कौन है? और प्रभु उनसे कहते थे, कि तुम्हें प्रमाणां की कमी नहीं है। यदि तुम सचमुच में मुझपर विश्वास करते हो, कि मैं ही मसीहा हूँ तो आपके पास अनके प्रमाण है और उसने कई एक प्रमाणां को उनके समाने प्रस्तुत किया। जैसे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का शब्द जो प्रभु के पक्ष में था और दूसरा प्रभु यीशु के बपतिस्मे के समय का पिता परमेश्वर का शब्द फिर वहाँ पर एक और अद्भूत कार्य होते हुए भी देखा जाता है। सो अनेकां प्रमाण थे, कि प्रभु यीशु मसीह सचमुच में मसीहा थे। प्रभु ने उन धर्म के अगुआें से कहा तुम लोग तो बाइबल के ज्ञाता हो और पवित्रशास्त्र में ये ढ़ूँढ़ते हो कि तुम ही अनंत जीवन देने वालों हो परन्तु ये जान लो कि पवित्रशास्त्र में सम्पूर्ण वचन मेरी ओर से इंगित करके लिखा गया है। मित्र यहाँ पर यह कथन हमें बताता है। कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र प्रभु यीशु मसीह के विषय में लिखा गया है और यहीं सच्चाई को प्रभु यीशु ने पवित्रशास्त्र में चेलो को बताया पवित्रशास्त्र में चार मुख्य उद्देश्य है। जिसे मैं अभी आपको बताना चाहूँगा। उसमें से पहला है, कि प्रभु यीशु मसीह पवित्रशास्त्र में ऐसा प्रस्तुत किया गया है, कि वे संसार के उद्धारकर्त्ता और पापों से छुटकारा दिलाने वाले है, और पवित्रशास्त्र का प्रथम उद्देश्य यहीं है। पुराने निमय में यीशु मसीह को उद्धारकर्त्ता या छुड़ाने वाला न कहकर वह आनेवाला है, कहा गया है, और नये नियम में ये कहा गया है कि वह आ गया है। वास्तव में पवित्रशास्त्र उसके आने के ऐतिहासिक संदर्भ को हमारे लिये प्रस्तुत करता है। दूसरा उद्देश्य जो पवित्रशास्त्र प्रस्तुत करता है। वह है, छुटकारा दिलाने वाले का इतिहास मित्र यहाँ पर और भी रोचक बात है। जब हम पवित्रशास्त्र के गहराईयां को देखते है। ध्यान दे कि इन विभिन्न विषयां के लिये पवित्रशास्त्र में कितना स्थान है। मैं सोचता हूँ, कि इससे हमें पवित्रशास्त्र को समझने में और भी आसानी होगी कि कौन-सा उद्देश्य है? और कौन-सा उद्देश्य नहीं है? उदाहरण के लिये नये नियम में प्रभु यीशु के चार सुसमाचारों को ले मत्ति रचित सुसमाचार, लूका रचित सुसमाचार, मरकुस रचित सुसमाचार और यूहन्ना रचित सुसमाचार यदि आप इन चारां में पुस्तकां कुछ अध्यन जोड़ना चाहते है, तो आपको 89 संख्या में आना पड़ेगा। क्यांकि इन चारों सुसमाचारों में 89 अध्याय पाये जाते है। जिसमें से चार अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जन्म और उनके प्रथम तीस वर्ष के जीवन के विषय में बताते है। लगभग 85 अध्याय में प्रभु यीशु मसीह के अंतिम तीन वर्ष के जीवन को बताया गया है, और 27 अध्याय में प्रभु यीशु के जीवन के आखीरी सप्ताह के विषय के बताते है। इन चारों सुसमाचारों के लेखक प्रभु यीशु मसीह के जीवन को एक विशेष और महत्वपूर्ण रूप से प्रस्तुत करते है। जैसे उनका जन्म, उनका प्रथम तीन वर्ष का जीवन और उनके तीस वर्ष की सेवकाई और विशेष करके उनके जीवन के अंतिम सप्ताह तथा हमारे पापों के लिये क्रूस पर प्रभु की मृत्यु और मृतकां में से जी उठना यदि हम सम्पूर्ण सुसमाचार में प्रभु यीशु मसीह के जीवन को देखते है, तो उनके जन्म और तीस वर्ष में जीवन से अधिक उनके जीवन का अंतिम सप्ताह अधिक महत्वपूर्ण दिखता है। हमलोग बड़े दिन को अधिक महत्व देते है। परन्तु पवित्रशास्त्र इस्टर को अधिक महत्व देता है। यदि हम यूहन्ना रचित सुसमाचार के अध्यायों को देखे तो प्रायः आधे अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जन्म उनके 30 वर्ष का जीवन और उनके तीन वर्ष की सेवकाई को विषय बताते है परन्तु बाकि अध्याय प्रभु यीशु मसीह के जीवन के अंतिम समयां के विषय में बताते है। यूहन्ना ने अपने सुसमाचार को दो भागां में विभाजित किया है। जैसे आधा अध्याय उसके जीवन के 30 वर्ष के और तीन वर्ष की सेवकाई के विषय बताते है। दूसरा आधा भाग केवल एक सप्ताह के विषय बताता है। इस सप्ताह को हम पवित्र सप्ताह कहते है। सो मित्र यहां पर कौन-सी बात महत्वपूर्ण है? कि प्रभु यीशु का जन्म या उनके जीवन या फिर उनका दुःख सहने का अंतिम सप्ताह उनकी मृत्यु कौन-सी बात महत्वपूर्ण है? अब्राहम लिंकन कहते है। कि प्रभु का जन्म और उनकी सेवकाई इतना महत्व नहीं रखते। दो सुसमाचारों में तो प्रभु के जन्म और उनके 30 वर्ष के जीवन के विषय कुछ भी नहीं बताया गया है। परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रभु यीशु क्यां संसार में आये। वो इसलिये आये कि बहुतो की छुड़ेती के लिये अपना प्राण दे? और वे अंतिम सप्ताह के लिये आये मेरे मित्र यदि आप पवित्रशास्त्र के विभिन्न विषयां को लेकर अलग-अलग रूप से विभाजन करे तो आप पायेगें। कि बाइबल मे कुल 1189 अध्याय पाये जाते है। उनमें से 11 अध्याय विश्व के एतिहासिक बातां का वर्णन करते है। जैसे पृथ्वी, मनुष्य, भाषा, शैतान और अन्य सबलोग तथा सृष्टि के दार्शानिक लोगों के विषय में विस्तृत रूप से बाइबल के इन प्रथम 11 अध्याय में पाये जाते है। जब आप उत्पत्ति के 12वें अध्याय में प्रवेश करेगें, तो आपको इब्राहिम नाम का एक व्यक्ति मिलेगा और इस 12वें अध्याय से लेकर बाइबल के अंत तक 1178 अध्याय पाये जाते है। जिसमें अब्राहम और उनके संतानां के विषय में लिखा गया है। सचमुच में बाइबल दो हजार वर्ष के इब्रानी इतिहास के विषय में बतती है। पवित्रशास्त्र का मुख्य उद्देश्य यह नहीं कि वो हमें सृष्टि के विषय बताये कि कैसे सृष्टि की रचना हुई परन्तु इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्यां का उद्धार और लोगों को पापों से छुटकारा दिलाना है और हमें बताता है कि उद्धार संसार में कैसे और किसके द्वारा आया? इसलिये सबसे पहले यह इब्राहिम के पास जाता है और इब्राहिम से मसीह यीशु के पास आता है और मित्र सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र का सारांश यही है। जो दो हजार वर्ष के इतिहास के विषय बताता है, और सृष्टि के विषय जो तीसरा उदाहरण है। उसका इस प्रकार से अवलोकन किया गया है। कि यदि हम पुराने और नये नियम के आकार की तुलना करे तो नये नियम में 260 अध्याय और पुराने नियम में 929 अध्याय पाये जाते है। जबकि परमेश्वर इस विषय में बहुत ही गंभीर है। क्या आप अपने मन में ऐसा न सोचते होगें कि परमेश्वर ने पुराने नियम में कुछ अधिक अध्याय दिये और नये नियम में कुछ कम दिये है, तो भी आज बहुत सारे लोग यह कहते है। कि मुझे अब पुराने नियम में केई रूची नहीं है। क्यांकि वह पुरानी बाइबल है। मुझे केवल नये नियम की आवश्यकता है, और जब हम अपने सर्वेक्षण में पुराने व नये नियम का अध्यन करेंगे तो लोग हमसे पूछेगें कृप्या हमें बताये कि नये नियम का सर्वेक्षण कब से प्रारंभ होगा। हम इससे भाग लेना चाहते है। परन्तु श्रोता मित्र मैं आपको बताना चाहता हूँ कि पुराने नियम के 929 अध्याय परमेश्वर के पवित्र शब्द है और इन वचनां से परमेश्वर हमसे बाते करना चाहते है। मैं आशा करता हूँ कि पुराना नियम आपके लिये बंद की हुई पुस्तक नहीं है। परन्तु यही वो बाते है। जिनसे प्रभु यीशु ने प्रेरितां के समझ को खोला था। पौलुस प्रेरित के अनुसार पवित्रशास्त्र का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है। कि परमेश्वर ने हमें पवित्रशास्त्र अपनी प्रेरणा से दिया है। ताकि परमेश्वर के लोग सिद्ध बने और हर एक भले कार्य के लिये तत्पर्य हो जाये। जो परमेश्वर उनसे कराना चाहता है। मेरे मित्र यहां पर हम सचमुच अपने विवक और समझ से कह सकते है कि पवित्रशास्त्र अविश्वासियों के लिये नहीं परन्तु विश्वासियां के लिये लिखा गया है और प्रत्येक स्त्री-पुरूष जो सचमुच में परमेश्वर के लोग बनना चाहते है। उनके लिये लिखा गया है। परमेश्वर पिता भी यही चाहते है कि मनुष्य उसकी महिमा करे, और पवित्रशास्त्र को जाने क्योंकि ये सभी पुस्तके सच्चाई से भरी हुई है। यूहन्ना रचित सुसमाचार में हम बाइबल के आखिरी उद्देश्य को देखते है। जिसमें अविश्वासियों को सम्बोधित किया गया है। यूहन्ना ने जब सुसमाचार लिखा उसने कहा परन्तु ये इसलिये लिखे गये है। कि आप उस पर विश्वास करे कि यीशु ही मसीह और परमेश्वर का पुत्र है, और उसपर विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाये। यूहन्ना चाहते है कि हमारे पास अनंत जीवन हो और वो ये भी चाहते है। कि हम यह जाने कि यीशु कौन है? और हमारा विश्वास कैसा है? इसलिए उन्हांने कहा कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र, मसीह है और उसके उपर विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ। पवित्रशास्त्र की इन पुस्तकां को किसने लिखा और कब लिखा और किन भाषाआें में लिखा? क्या उनके हाथ के लिखे हुए? प्रारंभिक विषय आज हमारे पास है। किसने इन पुस्तकों को हमारे लिये रचा है? हमारी भाषाआें में किसने इन पुस्तकां का अनुवाद किया। किसने इन पुस्तकों का चयन किया और पवित्रशास्त्र बाइबल में संगृहित किया। इन पुस्तकां का चयन करने के लिए किसने मनुष्य को अधिकार दिया और कब इनका चयन हुआ आज जो पवित्रशास्त्र हमारे पास है। उसे किसने संगृहित करके एक पवित्रशास्त्र का रूप दिया, और मित्र इस तरह से अनेक प्रश्न है। जिसे लोग आपको पवित्रशास्त्र के विषय पूछेंगे और यदि आपलोगां से कहेगें कि आपने पवित्रशास्त्र का सर्वेक्षण किया है, और उसके विद्यार्थी रहे है तो मैं सोचता हूँ कि लोग आपसे इन प्रश्नां का उत्तर पाने की आशा रखेगें। सो इन प्रश्नां के उत्तर देने के पहले सर्वप्रथम में आपको पवित्रशास्त्र के लेखक के विषय में कुछ बतना चाहता हूँ, किसने इसे लिखा और मैं आपको बता चुका हूँ। मित्र कि परमेश्वर ने इसे लिखा है, ईश्वरीय लेखक के विषय जब हम कहते है तो इसका क्या मतलब आप समझते है? परन्तु परमेश्वर की प्रेरणा शब्द से हम उसका उत्तर पा चुके है कि परमेश्वर ने अपनी प्रेरणा से मनुष्यों की जीवन में कार्य किया जिससे वे इस पुस्तकां को लिख सके। इसलिए सचमुच में परमेश्वर ने ही इन पुस्तकों को लिखा है। जब हम कहते है। कि पिता परमेश्वर ने इन पुस्तकों को लिखा, तो हमारे पास दो बातें है। जिसे हमे समझने की आवश्यकता है, और पहली बात है। प्रगटी करण और ये प्रगटीकरण वो है। जिसमें परमेश्वर ने सम्पूर्ण रूप से अपनी सच्चाई को पवित्रआत्मा के द्वारा मनुष्यों के सामने प्रगट किया है, और इस तरह से विभिन्न तरिकों से उसने अपनी सच्चाई को हमारे समाने प्रगट किया है। प्रेरणा शब्द हमे यह स्पष्ट करता है। कि आज के धर्म विद्ववान इसे विशेष प्रगटीकरण कहते है। पवित्रशास्त्र परमेश्वर का विशेष प्रगटीकरण है। इसका आरंभ भी है और अंत भी है। 1600 वर्षों तक परमेश्वर लोगां के जीवन में प्रगट होता रहा, जिससे वे लोग इन पुस्तकों को लिख सके। प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु के 90 वर्ष के बाद यूहन्ना ने प्रकाशितवाक्य के पुस्तक को लिखा और कहा कि यदि कोई इस भविष्यवाणी की पुस्तक की बातां में से कुछ निकाल डाले तो परमेश्वर उस जीवन की पेड़ और पवित्र नगर में से जिसकी चर्चा इस पुस्तक में है। उसका भाग निकाल देगा। यह एक अद्भूत कार्य है। इसलिए इसे विशेष प्रगटी करण कहते है। कभी-कभी मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि क्या परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मुझसे बात करता है यह प्रगट होता है और यह सच है। मित्र परमेश्वर ऐसा कर सकता है। तब फिर मन में ये प्रश्न आता है। कि इनमें से कौन-सा प्रगही करण अधिक महत्वपूर्ण है? क्यांकि मैं दोनों प्रगटी करण पर विश्वास करता हूँ और मैं यह विश्वास करता हूँ। कि व्यक्तिगत प्रगटी करण के उपर विशेष प्रगटीकरण का अधिकार नियमित बना रहता है। यदि मैं एक पास्टर हूँ और कोई आकर मुझे यह कहे कि मैं अपनी पत्नी को छोड़ रहा हूँ तब मैं उससे एक प्रश्न पूछता कि क्या वह विश्वास योग्य नहीं है और वो कहता नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है। परन्तु मैं उसे युही छोड़ना चाहता हूँ, क्यांकि मैं उसे प्रसंद नहीं करता और मैं कभी भी विवाह नहीं करूँगा, और श्रोता यदि वो मुझसे ऐसा कहता कि परमेश्वर ने मुझे ऐसा कहा है कि उसे छोड़ तब मैं अपने अधिकार में बहुत ही कठोर होकर उत्तर देता, कि परमेश्वर तुमसे ऐसी बात कह ही नहीं सकता क्यांकि इस विशेष प्रगटी करण में परमेश्वर आपको ये अनुमति नहीं देता है कि आप उसे छोड़ दों। धार्मिक अगुवे कहते है। कि विवाह का संबंध तोड़ने के लिए नहीं है। अर्थात् इसका मतलब की आप इससे अलग नहीं हो सकते है और यही बात विशेष प्रगटी करण कहता है। व्यक्तिगत प्रगटी करण कभी भी विशेष प्रगटी करण का विरोध नहीं कर सकता। मित्र मैं व्यक्तिगत प्रगटी करण पर विश्वास करता हूँ। पर मैं सोचता हूँ कि इस विषय पर कुछ विशेष चेतावनी है। जिसे हम यहाँ पर देखेगें। जब हम कहते है कि परमेश्वर ने मुझे कहा है तो इस विषय पर हमें बहुत सावधान और सचेत रहना चाहिए अनेक समय हम कहते है। कि परमेश्वर ने मुझसे कहा है, पर सचमुच में परमेश्वर ऐसे हीं कहते कभी हम अपने स्वय के अनुभव व इच्छा को परमेश्वर की इच्छा समझते है, और अंत में हम कहते है, कि परमेश्वर ने मुझसे कहा है। मुझे याद है जब हम एक कलीसिया का भवन निर्माण कर रहे थे, तो उसे निर्माण करने के लिये हमारे पास एक अच्छी योजना थी। पर जब भवन तैयार हो गया, और उसमें रंग लगाकर पोताई करने की बात हुई तब लोग उसमें सहमति नहीं हुए सबके पास अपना अलग-अलग विचार था, और उनके सुझाव अगल-अगले थे। वो कहते थे ऐसा-ऐसा रंग लगाया जायेगा तो अच्छा होगा और जब हम इस विषय पर विचार-विमर्स कर रहे थे तो एक महिला एक संध्या की आत्मिक सभा में आयी। उसके हाथ में एक बड़ी दरी थी उसने साधारण रूप के यह नहीं कहा कि यह रंग मंदिर के लिये बहुत अच्छा होगा पर उसने कहा परमेश्वर ने मुझसे कहा है कि यह रंग मंदिर के लिये बहुत अच्छा होगा। परन्तु मैंने उस पर विश्वास नहीं किया और जब लोग ऐसी बात करते है तो मैं उप पर तुरन्त विश्वास नहीं करता मैं सोचता हूँ। कि वह अपनी ही मन से ऐसा कह रही थी। मित्र इस विषय पर हमें बहुत ही सावधान रहने की आवश्यकता है। प्रगटी करण और प्रेरणा शब्द के उपर जब हम ध्यान करते है तो विशेष बात यह है कि आज संसार इस प्रकार के शब्दों पर जोर दे रहा है। जैसे कि बु़द्धवाद तर्क संगत या मानववाद जब आप मसीही बनते है। तब आप विवके हीन तर्क-विर्तक करने वाले ना समझ नहीं बनते है और यही बात मैं विश्वासियां के बीच में भिन्नता देखता है। जो सचमुच में पवित्रशास्त्र और परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते है। परन्तु जो लोग अपनी मत्ती और अपने विचार के द्वारा तर्क-विर्तक करते है। वे लोग अपने बुद्धि का अनुशरण करते है, और वे उसे ही प्रगटी करण कहते है वे कहते है। मुझे किसी दर्शन या प्रकाशन की आवश्यकता नहीं है। मेरे पास बुद्धि है। परमेश्वर हमें अपने पवित्र वचन के द्वारा यह बता देते है। कि हम सही और गलत को जान सके, और धार्मिकता के द्वारा जिससे हमें निर्देश मिलता है। वही प्रकाशन है और इसी लिए हम कहते है, कि परमेश्वर ने इन पुस्तको को लिखा है। हम ये भी कहते है कि मनुष्यां ने इन पुस्तकां को लिखा। हाँ मित्र मनुष्यां ने इन पुस्तकों को लिखा है जो मछली पकड़ने वाले मछुवे थे। जो राजा थे, जो चरवाहे थे। साधारण लोग थे। एक तो बैद्ध थे। एक नाके दार था। वे सभी प्रकार के लोग थे। यदि आप इन लोगों के विषय पढ़े जिन्हांने धर्मशास्त्र को एक साथ जोड़ा तो आपको यह मानना पड़ेगा जिससे इस प्रकार का प्रश्न उत्पन्न होगा। कि कब लोगां ने स्वर्ग में कला के कार्य को सीखा वे विभिन्न स्थानां से थे। विभिन्न उम्र के थे। और यह सत्य है पर प्रश्न बहुत अच्छा है। श्रोता मित्र यदि आप इस सच्चाई पर थोड़ा गौर करे। कि इन मनुष्यों ने इन पुस्तकों को लिखा है। तो आपको थोड़ा और खोज करना पड़ेगा। तभी आप इस विषय पर कुछ जानकारी और सच्चाई को प्राप्त कर सकते है। कि कैसे ये अद्भूत कार्य हो सके, और इस प्रकार से आप इन प्रश्नों के उत्तर को प्राप्त कर सकते है। उदाहरण के लिये पुस्तकां के चुनाव के अनुसार आप उनकी खोज करे लगभग 100 ।क् के समय जो परिसत था। वो जमनिया का परिसत कहलाता था। ये सब निश्चित थे और ये पुस्तकें सचमुच मैं तीन या 400 वर्ष पहले की एक साथ लाई गई थी। और नये नियम की पुस्तके 692 ।क् के लगभग संग्रहित करके चुन ली गई थी। और उस समय एक और परिसत था। जिसे टुलन का परिसत कहा जाता था, और वहीं पर उसे एक साथ जोड़ा गया। पुराने नियम के पुस्तकों में महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलता है। कि उसका लेखक या तो भविष्यवक्ता है या फिर शास्त्री है। और नये नियम की पुस्तकों के माप में एक स्तर देखने को मिलता है। और यह एक विधि कहलाता है जो तीन भागों में आया है, और वो 3भाग ये है। कि क्या ये पुस्तके प्रेरितों द्वारा लिखी गई है। या प्रेरितों के सहयोग द्वारा लिखी गई है। क्या इन पुस्तकां में आत्मिक बाते है। जो सचमुच में विश्वासियां को आत्मिक रूप से तृप्त करते है, और उनके आवश्यकताआें को पूरा करते है, और क्या वे इन सब पुस्तकां पर एक मत से सहमत है। नये नियम मैं ये पुस्तके बहुत ही सावधानी के साथ चुनी एवम् रची गई है। अनेक लोग एपोक रिफा पुस्तकों के विषय पूछते है। जो बाईबल के नहीं है। कुछ कलीसिया के लोग इस पर विश्वास करते है कि यह भी परमेश्वर का वचन है। एपोकरिफा की पुस्तके सन् 1546 में संशोधित की गई परन्तु जब मूल और प्रारंभिक पुस्तके चुन ली गई थी। तब इन पुस्तकां का चयन नही हुआ था और मित्र जैसे आप पवित्रशास्त्र के इतिहास के विषय अध्ययन कर रहे है तो आपको कुछ अन्य बातां पर ध्यान करना होगा कि किन-किन भाषा में पवित्रशास्त्र सर्वप्रथम लिखा गया हम जानते है, कि पुराना नियम इब्रानी भाषा में और नया नियम ग्रीक भाषा में लिखो गया। बाइबल के इतिहास के विषय जो दूसरा विषय है। वह है कि मनुष्य इसका लेखक बना आप थोड़ा ध्यान दे। कि कितना समय पहले यह पुस्तक लिखी गई प्रत्येक रूप से हमारे पास ये वास्तविक लिखे हुए वचन नहीं थे। तभी इन वचनां का अनुवाद हमारी अपनी भाषा में हुआ और वह अनुवाद पूर्णरूप से इतिहास बना अगला विषय कि जैसे हम पवित्रशास्त्र के पृष्ठभूमि को ध्यान करे तो एक और महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आता है। वह प्रेरणा आप कैसे जान सकते है? कि परमेश्वर का वचन प्रेरणा दायक वचन है। मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह ने एक बार हमशे कहा था। यदि कोई जानने की इच्छुक हो तो वो जान सकता है। प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ये प्रमाणित कर सकते है। कि बाइबल सच में परमेश्वर का वचन है। सो मित्र आज का यह सर्वेक्षण यहा समाप्त होता है। अगले कार्यक्रम में अवश्य उपस्थित होवें प्रभु आपको आशिष दें।

-ःआमिनः-

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