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बाईबल क्या है?

नमस्कार मित्र वेद पाठशाला के इस नये कार्यक्रम में हम आपका हार्दिक स्वगत करते है। मित्र यह पाठशाला धर्मशास्त्र अध्यन की एक कक्षा है। जिसमें परमेश्वर के वचन के तीन सौ साठ पाठ का अध्यन हम प्रारंभ से अंत तक करेंगे। ऐसा लगता हैं। कि यह एक लम्बी यात्रा है। परन्तु यह जल्दी ही समाप्त हो जायेगी। इस पाठशाला के विषय में बहुत उत्साहित हूँ और मैं जानता हूँ, कि आप भी उत्साहित होगें। सो मित्र इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए आप योजना बनाये। और दूसरां को भी अवगत कराये, तभी वे सभी इस महत्वपूर्ण पुस्तक के अध्ययनशाला में उपस्थित हो सके। उदाहरण के लिये यदि आप लोगां के साथ दल बनाकर किसी यात्रा में या किसी पवित्र स्थान में जाते है और अनेक वर्षों के बाद जब आप पुनः उनसे मिलते है। तो आप अपने उस पुराने अनुभव को एक-दूसरे को बताते है और आनन्दित होते है। मैं ऐसा अनुभव करता हूँ कि यदि हम इस अध्यन शाला की अगली यात्रा को इसी तरह से प्रारंभ करेंगे, तो बहुत अच्छा होगा। क्यांकि इस सर्वेक्षण में हम पवित्रशास्त्र के 66 पुस्तकां का अध्यन करेंगे, और उन पुस्तकां के सर्वेक्षण के लिये योजना बनायेगे। मित्र इस इन पुस्तकां के सर्वेक्षण के लिये हम निम्न विषयां पर ध्यान करेगें। उसमें पहला है, कि हम प्रत्येक पुस्तक का सारांश देखेगें उसकी महत्वपूर्ण रूपरेखा देखेगें और तीसरा प्रत्येक पुस्तक में से भक्तिपूर्ण संदेशां को देखेगें। अर्थात् हम अपने व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर के वचन को लागू होते देखेगें। श्रोता इस पाठशाला का सर्वेक्षण याजकिय लोगों को निर्देश करता है? और मैं व्यक्तिगत रूप से विश्वास करता हूँ कि संवतः कलीसिया में याजकिय लोग पाये है। जिन्हें हम कलीसिया के सदस्य कहते है। प्रेरित पौलुस अपने दर्शन को हमारे साथ बांटकर कहते है, कि संतां की पूर्णता ही सेवकाई के कार्य है। जिसमें हम सभो को एक साथ आना है। यहाँ पर पौलुस इफिसियां की पत्री उसके चौथे अध्याय 12 पद से हमें सीखा रहे है। कि पवित्र लोग सिद्ध हो जाय और सेवा के कार्य किये जाय, यदि हम सेवकाई के कार्य को होते हुए देखना चाहते है। तो हमें चाहिए कि कलीसिया के लोगां को सिद्ध बनाये। मित्र इस पाठशाला के अध्यन में हमारा यह उद्देश्य है, कि जैसे हम बाईबल के एक-एक पुस्तक का अध्यन करते है। जिससे कलीसिया के अगुआें का विश्वास प्रभावकारी हो सके। और जब वे अपने मित्रां अपने पड़ोसियां अपने परिवारों के पास जाते है। तो वे उनके विश्वास को मजबूत कर सके। जैसे हम पवित्रशास्त्र के उन 66 पुस्तकों का सर्वेक्षण करेंगे। तो मैं आपके बाईबल के कुछ निश्चित भाग पढ़ने को ढ़ूँगा। तभी यह हमारा उद्देश्य पूरा हो सके। समय-समय पर मैं आपको लिखित कार्य भार दूँगा। जिसमें कुछ प्रश्न होगें, जो आपके बाइबल के प्रत्येक पुस्तक का सारांश और भक्तिपूर्ण संदेश, रूपरेखा और अपके व्यक्तिगत जीवन में इन पुस्तकों के वचनां का उपयोग आपके जानने में आपका सहायता प्रदान करेगा। समय-समय पर आपको हम अवसर देंगें, कि आप अपने प्रश्न हमें लिखकर भेजे और हमसे सम्पर्क बनाये रखे, कार्यक्रम के अंत में हमारे उद्घोषक आपको हमारा पता भी बतायेगे। पवित्र बाइबल के 66 पुस्तकां के सर्वेक्षण में जो विस्तृत सामग्री में आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, उसे आप देखेंगें और यदि आपने उत्पत्ति से लेकर प्रकाशित वाक्य तक बाइबल को पढ़ा है। तो आप समझ पायेगें। कि यह एक सामग्री ही है और उसका केवल एक परिचय है। मित्र प्रारंभ से ही मैं आपको यह चुनौती देना चाहता हूँ। कि यदि आप इस अध्यन के कार्य को बोझ से करते है। अर्थात् दिल से करते है, तो यह अध्यन आपके लिये बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। पौलुस प्रेरित कहते है। कि जब बाइबल का विषय हमारे सामने एक कार्यशाला की तरह आता है। तो एक ही बात हमें घबरा देती है। और लज्जित होने दूर रख सकती है। वह है कार्य मित्र बाइबल का समझे का एक मात्र तारिका है। कि हम परिश्रम करे यहाँ पर आपको मैं यह चुनौती देना चाहूँगा। कि इस अध्यनशाला के प्रारंभ से ही आप यह निश्चय करे। कि मैं कोई भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं रहूँगा और जो कार्य मिलेगा, उसे मैं पूरा करूँगा। अनेक लोगां ने इस प्रकार से अध्यन किया और वचन का ज्ञान प्राप्त किया है। और इसी तरह से मित्र यदि आप भी प्रेरित होते है। तो आप भी वचन की गहराईयां को जानने में रूची रखेगें हमने आप लिये बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका भी तैयार की है, जिसमें आपको समझने में सहायता प्राप्त होगी। इसलिए आप अवश्य पत्र लिखकर इसे मुफ्त में प्राप्त कर ले और अपने अध्यन में इसका उपयोग करे। हमारे इस अध्यनशाला के प्रारंभ में आपको मैं और कुछ कहना चाहूँगा। कि जैसे हम इस अच्छे यात्रा में आगे बढ़ते है। तो आपको चाहिए, कि आप उन औजारां को अपने पास रख ले। जैसे आप जानते है। कि एक बढ़ई, एक मिस्त्री, एक दांत का डॉक्टर, एक घड़ी सुधारक इन सभो के पास अपनी-अपनी औजारे होती है। और उन्हें ये मामूल होता है कि किस प्रकार किस समय इन औजारां का उपयोग किया जाय? सो मित्र जैसे आप धर्मशास्त्र के इन गंभीर वचनों का अध्यन करने जा रहे है। तो आपको भी कुछ महत्वपूर्ण औजारां की आवश्यकता है। जिन्हें मैं आपको बताना चाहता हूँ। पहला औजार है, जो स्पष्ट है, और वो है आपकी बाइबल में आपको सलाह देना चाहता हूँ कि आप एक अच्छी बाइबल अपने पास रखे और वचन को स्मरण रखने के लिये आप उसमें चिन्ह अंकित करे। जब आप ऐसा करेंगे। तो उन पदां से आप अच्छी तरह से परिचित हो जायेगें और अनेक वर्षों तक आप बाइबल का अध्यन कर पायेगें। सो मित्र यदि आप इस अध्यन में रूची रखते है, तो मेरी यह सलाह है, कि आप एक अच्छी बाइबल को अपने पास रख ले। आजकल बहुत अच्छे-अच्छे अनुवाद के बाइबल मिलते है। जो पढ़ने में और समझने में बहुत ही सरल है। उनमें से दो-तीन प्र्रकार के बाइबल आप रख ले। जिससे आपको समझने में सहायता मिलेगी। दूसरा औजार जो बाइबल अध्यन में आपको रखना है। वह है, बाइबल शब्दकोष यह शब्दकोष वो पुस्तक है। जो आपको बाइबल के लिखे प्रत्येक लोगां के विषय प्रत्येक स्थान के विषय प्रत्येक वस्तु के विषय और उनके अर्थ के विषय में बतायेगी। अगला महत्वपूर्ण औजार है, शब्दानुक्रमाणिका ये वो पुस्तक है। जो आपको बाइबल के प्रत्येक शब्दों को बतायेगी। कि वो कहा पाये जाते है। यदि आपके पास यह पुस्तक है तो आप वचन का अध्यन भालि-भाँति कर सकते है, और कोई भी विचार कोई भी विषय लेकर उसे उस पुस्तक में देख सकते है, और वो पुस्तक आपको बाइबल के उत्पत्ति से लेकर प्रकाशित वाक्य तक उन शब्दों को बतायेगी। जहाँ-जहाँ उनका उपयोग हुआ है। इसलिए बाइबल के विद्वान इस पुस्तक को बहुत प्रसंद करते है। दूसरी बता की इस पुस्तक से हम उन पदों को ढँ़ूढ़ सकते है। जिसे हम जानते तो है पर कहा लिखे है। वो हम याद नहीं रहते जैसे एक पद है। कि रूपियों का लोभ सब बुराई की जड़ है। ये कौन-सी पुस्तक के किस अध्याय के किस पद में लिखे है? बहुत से बार हम अनेक वचनों को नहीं जान सकते परन्तु यह पुस्तक हमारी सहायता करती है, और हमें बताती है। मित्र यदि हमें उस पद को ढूँढ़ना है, तो इस पुस्तक में से देखे जहाँ रूपियां लोभ, बुराई, और जड़ लिखा हुआ है और किसी भी एक शब्द को देखकर बहुत ही जल्दी हम उस पद को प्राप्त कर सकते है। श्रोता बाइबल सर्वेक्षण के लिये कुछ और औजार है जो अध्यन में सहायक सिद्ध होते है और उनके लिये भी मैं आपसे अनुरोध करता हूँ। कि आप उन्हें प्राप्त कर ले बाइबल की कुछ टिका पाये जाते है, और हमारी बाइबल दर्शक नामक पुस्तिका की भी एक छोटी टिके के जैसे ही है। यदि आप हमसे सर्म्पक करके इसे प्राप्त कर लेते है, तो यह अध्यन में आपके लिये सहायक सिद्ध होगी। अर्थात् यदि कोई आपको इस विषय में प्रश्न पूछे तो आप इसके द्वारा सही उत्तर दे सकते है। फिर अध्यन के समय आपके पास कागज व कलम होनी चाहिए, ताकि आप कुछ महत्वपूर्ण बातां को लिख सको और उनको याद रख सको। ध्यान रहे मित्र कि हम एक लम्बी यात्रा को आरंभ कर रहे है। सो कृप्या अपने औजार अपने पास अवश्य रख ले और कभी भी इस अध्यनशाला में चुके नहीं परन्तु बराबर उपस्थित रहे। सुसमाचारों में हमें बताया गया है। कि प्रभु यीशु मसीह मुर्दो में से जी उठने के पश्चात् चेलां के पास गये और उन्हें बाइबल कि सच्चाइयां को बताया और चेले अपने जीवन में प्रथम बार बाइबल को समझे और उस सच्चाई ने उनके समझ को खोला कि वे बाइबल को समझ सके मेरे मित्र आत्मा की अगुवाई से मैं उन सच्चाईयों को आपके साथ बांटना चाहता हूँ और आशा करता हूँ। कि यह सच्चाई बाइबल को समझने के लिये आपकी समझ को अवश्य खोलेगी। मित्र मैं सबसे पहले चाहूँग। कि हम बाइबल की परिभाषा और व्यख्या के उपर विचार करे कि बाइबल क्या है? अधिकांश बाइबलां के शीर्षक पवित्रशास्त्र होता है। अर्थात् पवित्र बाइबल मित्र इसका क्या अर्थ होता है? ये बाइबल शब्द जो है, वो विविलिया शब्द से आता है। जिसमें बहुवचन पाये जाते है। यदि आप इसके प्रारंभिक शब्द को देखेगें, तो यह कहता है। पुस्तके अर्थात् केवल एक ही पुस्तक नहीं परन्तु बाइबल 66 पुस्तकों का संग्रह है, और जब हम कहते है कि यह पुस्तक पवित्र पुस्तकों का एक संग्रह है, तो इसका अर्थ क्या होता है? मित्र पवित्र शब्द का अर्थ है, जो परमेश्वर का है या जो परमेश्वर की ओर से आता है। यहाँ पर परमेश्वर इन पुस्तकां के साथ कुछ महान कार्य करने को क्रियाशील है। सो यह पुस्तक परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिये महान पुस्तक है, और इसी लिए यह पुस्तक एवम् इसका अध्यन संसार में एक महत्वपूर्ण अध्यन है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसने हमें ये अवसर दिया कि उसकी इस महान पुस्तक का अध्यन हम कर सकते है। आपने सुना होगा। कि कई लोग इसे परमेश्वर का वचन कहते है। मित्र जब हम इसे परमेश्वर का वचन कहते है तो इसका अर्थ हम क्या समझते है। क्यांकि यह परमेश्वर की ओर भविष्यवक्ता और प्रेरितों द्वारा बताया गया है। 2तिमुथियुस उसका तीसरा अध्याय 16 और 17 पद में पौलुस प्रेरित ने पवित्रशास्त्र के विषय जो विवरण व्यक्त किये है। वो इस प्रकार है। हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है। और उपदेश और समझाने और सुधारने और धर्म की शिक्षा के लिये लाभ प्रद है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने और हर एक भले कार्य के लिये तत्पर्य हो जाये। सो मित्र वचन में जो शब्द लिखे गये है। वो मनुष्यों के नहीं परन्तु वे सब परमेश्वर के शब्द है। इस पुस्तक को लिखने में लगभग 1500 से 1600 वर्ष लगे है, और उन लोगां का लिखना पुस्तकां का एक संग्रह बना। जिसे आज हम पवित्र बाइबल कहते है। प्रायः सभी बाइबलां के शीर्षक में पवित्रशास्त्र लिखा होता है, और जब हम इस पुस्तक को पवित्रशास्त्र कहते है। उसका क्या अर्थ होता है? पवित्र शब्द का अर्थ है? कि वो परमेश्वर की तरफ से है या वो परमेश्वर की ओर से आता है इसका उद्गम स्वयं परमेश्वर है। यहाँ पर हम जो कहना चाहते है, वो ये है, कि यह पुस्तक परमेश्वर से विशेष रूप से सम्बन्धित है, और यह पुस्तक संसार में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसलिये पवित्रशास्त्र का अध्यन भी इस संसार में एक महत्वपूर्ण अध्यन है और तभी मित्र परमेश्वर के पास एक संदेश है। जिससे वो मनुष्य के साथ सम्बन्ध बनाना चाहता है। वे अनेक लोगों के जीवन में चले फिरे विशेष कर उन चालीस लोगों के साथ जिन्होंने परमेश्वर से प्ररेणा पाकर परमेश्वर के वचन को लिखा 1500 से 1600 वर्ष के अंतराल में इन लोगां ने इन किताबों को लिखा जिसे आज हम पवित्रशास्त्र कहते है, और जिस प्रक्रिया से परमेश्वर ने इस लोगां में होकर कार्य किया वो था। परमेश्वर की प्ररेणा पौलुस कहते है कि ये पुस्तके परमेश्वर की प्ररेणा से परमेश्वर द्वारा आयी, प्ररेणा शब्द का अर्थ है। स्वांस लेना और पवित्र आत्मा की समार्थ से परमेश्वर के स्वांस ने इनमें होकर कार्य किया कि वे इन पुस्तकों को लिख सके। पतरस इस वचन को इस तरह से वर्णन करते है। कि हम प्रभु यीशु मसीह के आगमन और उनके सामर्थ को जानने के बाद चतुराई का पीछा नहीं करते पर ये हमारे आखां देखी बात है और पवित्रशास्त्र की कोई भी भविष्यवाणी किसी के अपने ही विचार धारा के आधार पर पूर्ण नहीं हुई, क्योंकि कोई भी भविष्यवाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त लोग पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की सामर्थ से बोलते थे। प्रेरित पौलुस बताते है। कि जिस प्रक्रिया से पवित्रशास्त्र आया वो था। परमेश्वर की प्रेरणा पतरस बताते है। कि ये प्रेरणा क्या है? फिर वो कहते है। यह संदेश जिन्हें मनुष्यां ने लिखा वो उनकी स्वयंम् की विचार धारा नहीं थी। परन्तु वे परमेश्वर द्वारा उत्पन्न हुए थे। इस प्ररेणादायक पुस्तक में जितने भी संदेश लिखे गये है। वो सब परमेश्वर के हृदय से उत्पन्न हुए है। परमेश्वर पिता इन संदेशों से पवित्रआत्मा की सामर्थ के द्वारा मनुष्यों से सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। पतरस ने ग्रीक भाषा में एक सुंदर शब्द का प्रयोग किया है, और वो शब्द है। हेरो अनेक स्थानों पर पुल की जगह नौका का उपयोग होता है, और यह सच है, कि जिन क्षेत्रां में अधिक पानी होता है। हम उन क्षेत्रों में नाव का उपयोग करते है। जो हमें एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाती है और यह नाव जो एक छोर से दूसरे छोर ले जाती है। वह नौका कहलाती है। ग्रीक शब्द हेरों का अर्थ यही है। पतरस भी इसी शब्द का प्रयोग करता है, और कहता है। कि परमेश्वर इन लोगां में होकर चलते है। दूसरा स्पष्टीकरण है। परमेश्वर का जीविंत वचन ओ प्रभु यीशु मसीह में लागू होता है। धर्मशास्त्र परमेश्वर का लिखा हुआ वचन कहलाता है। परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने कहा परमेश्वर का वचन जीवित और पवित्र है। परमेश्वर ने इस पुस्तक के द्वारा हमसे बड़ी और महान बाते कही है। परन्तु परमेश्वर ये भी कहते है, कि वो अपने पुत्र प्रभु यीशु मसीह के द्वारा और भी बड़ी-बड़ी और महान बाते हमसे कहते है। परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह के जीवन और उनकी शिक्षाओं के द्वारा संसार से अधिक बाते कहीं इसलिए प्रभु यीशु मसीह इसे परमेश्वर का जीवित वचन कहते है। हम कहते है, कि पास्टर परमेश्वर के वचन का प्रचार करते है। हाँ मित्र परमेश्वर के वचन का प्रचार करना महान और अद्भूत बात है। किसी ने इस तरह से इसे वर्णन किया है। कि परमेश्वर के वचन का प्रचार करना, परमेश्वर के आत्मा से परमेश्वर के दासों के द्वारा होता है। जिससे परमेश्वर के संतान तैयार होते है। पौलुस कहते है, क्रूस की कथा नाश होने वालां के निकट मूर्खता है। पर हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ है, और मित्र यह परमेश्वर को भाता है। क्यांकि लोग विश्वास करते है, और उद्धार पाते है, पौलुस इसे नहीं समझ पा रहे थे। परन्तु उन्हांने विश्वास किया और उसके लिये वे समर्पित हो गये। जब उन्हांने प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार का प्रचार किया, तो लोगां ने उद्धार पाया और परमेश्वर की संतान बन गये मित्र अब मैं आपको बाइबल के कुछ संगठन के बारे में बताना चाहता हूँ। ये 66 पुस्तके उस तरह से नहीं रखे गये है। जिस तरह से वो लिखे गये है या उनके लेखक जीवित रहे है। आप ऐसे विचार करते होगें परन्तु यह ऐसा नहीं है। वे पुस्तके बाइबल में उस तरह से रखे गये है। कि वो किस प्रकार की पुस्तके है। इन पुस्तकां में दो भाग है। प्रथम भाग कहलाता है। पुराना नियम और दूसरा भाग कहलाता है। नया नियम प्रभु यीशु मसीह के दिनां में इस तरह का पुराना व नया नियम नहीं था, और उस समय नया नियम लिखा भी नहीं गया था। सो प्रभु यीशु मसीह के समय जो पुस्तके थी। उन्हें केवल परमेश्वर का वचन या पवित्रशास्त्र कहा जाता था। परन्तु जब नया नियम लिखा गया और सभी पुस्तकां को एक साथ संग्रहित किया गया। तभी नये व पुराने नियम में विभाजित किया गया, पुराने नियम के पुस्तकां का जो मुख्य संदेश था। वो था, यीशु आनेवाला है, और सचमुच में यही बात वो सब कहते थे। पवित्रशास्त्र के अनुसार प्रारंभ में परमेश्वर और मनुष्य के बीच संगति थी, परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य को सृष्टि के उपर स्वतंत्रता दी थी। कि वो अपने तरफ से किसी का भी चुनाव कर सकता था। परन्तु मनुष्य ने परमेश्वर से अलग होने का चुना किया और पिता पमरेश्वर जो इस प्रकार का विद्रोह और अनाज्ञाकारिता नहीं देख सकते थे। मनुष्य से अलग हो गये। तब से परमेश्वर और मनुष्य क बीच अलगांव है और यही अलगांव की समस्या को पवित्रशास्त्र हमे बताता है। पुराने नियम परमेश्वर कहते है, कि क्या तुम मुझपर विश्वास करोंगे। जब मैं तुमको अलगांव के विषय, कुछ बताऊगा, और नये नियम में परमेश्वर कहते है। कि क्या तुम, मुझपर विश्वास करोगें। जब मैं तुझको इस अलगांव के विषय कुछ बताऊ। कि मैंने इसके लिये कुछ कर लिया है। मित्र यहाँ पर आप देखे कि पुराना नियम कहता है। कि यीशु आने वाला है और परमेश्वर तथा उसकी सृष्टि के बीच जो अलगांव है। उसे वह मिलाना चाहता है, और नया नियम हमें यह शुभ संदेश सुनाता है। कि प्रभु यीशु आ गये है, और जब वे आ गये है, तो मनुष्य और परमेश्वर के बीच जो अलगांव था। उस अलगांव को उन्हांने दूर करके मनुष्य के साथ मेल-मिलाप करा दिया है। मरकुस रचित सुसमाचार में दो शब्द है। जो नये नियम को जोड़ते है, और वो है। यीशु आये पुराने नियम की पुस्तकें पांच विभिन्न शीर्षकों के बीच आती है, और इसमें पांच अलग-अलग प्रकार की पुस्तकें है। जिसमें पहला है। व्यवस्था की पुस्तकें और ये व्यवस्था की पुस्तकें पूर्णरूप से परमेश्वर के वचन है। इन पुस्तकां से परमेश्वर हमें ये बताते है कि क्या गलत है? और क्या सही है? इसे परमेश्वर हमें ठीक करते है और अपनी उच्च धार्मिकता को बताते है और पांच व्यवस्था की पुस्तके दस इतिहासिक पुस्तकां के साथ चलती है। ये दस इतिहासिक पुस्तके हमें बताती है। कि कुछ समय परमेश्वर के लोग इस व्यवस्था की पुस्तकां का पालन करते है और कुछ समय नहीं करते है, और जब वे उन व्यवस्थाआें को पालन करते है तो वे हमारे लिये एक नमूना बन जाते है। कि हम उनका अनुसरण करे, परन्तु जब वे अनाज्ञाकारी होते है और उनका पालन नहीं करते, तो उनका वो जीवन हमारे लिये एक चेतावानी बन जाता है। इतिहासिक पुस्तकों के बाद काव्यात्मक पुस्तकें आती है। ये काव्यात्मक पुस्तकें परमेश्वर के लोगां के लिये संदेश है। जो उन लोगां के हृदय से इन वचनां से बाते करना चाहते है। जैसे कि अयुब की पुस्तक में हम देखते है। जब परमेश्वर के लोग दुखित या पीड़ित होते है, तो यह उनके लिये परमेश्वर का संदेश है। भजनसंहिता के पुस्तक के अनुसार जब परमेश्वर के लोग परमेश्वर की अराधाना करते है, तो वह उनके लिये परमेश्वर का संदेश है। अर्थात् जो कुछ भी आपके हृदय में है। वो सब कुछ अराधना द्वारा परमेश्वर तक पहुँचना चाहिये और यहीं भजनसंहिता का संदेश है। नीति वचन के पुस्तक में परमेश्वर चाहता है। कि मनुष्य व्यवहारिक ज्ञान को प्राप्त करे सभोपदेशक की पुस्तक भी परमेश्वर के लोगां के लिये परमेश्वर का संदेश है। श्रेष्ठगीत की पुस्तक भी एक ऐसा संदेश है। जो उन लोगां को प्रेसित करती है। जब वे प्रेम करने लगते है। जिसे पढ़ने से दो प्रेमियां के प्रेम गाथा का वर्णन पता चलता है। पुराने नियम में जो दूसरा भाग है। वह है नबियों की पुस्तके ये भी दो भागां में विभाजित है। प्रथम है, भविष्यवक्ताआें की बड़ी पुस्तकें और दूसरा है। भविष्यवक्ताआें की छोटी पुस्तके, भविष्यवक्ताओं की बड़ी पुस्तके इसलिए बड़ी नहीं कि वे उच्च और वरिष्ठ किताबें है। परन्तु इसलिये कि उनके अध्याय और आयत बड़े है और छोटी पुस्तकों के छोटे है। फिर नया नियम में हमारे पास पांच प्रकार की पुस्तके है। पहला है प्रभु यीशु मसीह के जीवन सम्बन्धित चार सुसमाचार इन चारों सुसामाचार में प्रभु यीशु मसीह के जीवन को अलग-अलग तरह से प्रस्तुत किया गया है। दूसरा है, इतिहासिक पुस्तक जिसे प्रेरितां के काम कहते है। तीसरा है पौलुस की पत्रिया और चौथा है, सामान्य पत्रियां नये नियम की आधी पुस्तके पौलुस पेरित द्वारा लिखी गयी है। इसी लिए आपके पास पौलुस की पत्रिया है। फिर हमारे पास सामान्य पत्रिया है, जो अन्य लोगों द्वारा लिखी गई है। पांचवां भाग है, जिससे नया नियम समाप्त होता है। वो कहलाता है। भविष्यवाणी की पुस्तक जिसे प्रकाशितवाक्य कहते है। जो आने वाले दिनां का प्रतिक है। यदि आप इस पुस्तक की बातां को समझना चाहते है, तो आप पवित्रआत्मा की अगुवाई से इसे भली-भाँति समझ सकते है। इस पुस्तक के पहले वाक्य में लिखा है। यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य सो मित्र आज हमने देखा बाइबल में जो 66 पुस्तके है। वो इस तरह से व्यवस्थित नहीं की गई है। जिस तरह से वो लिखी गई है। परन्तु वो किस तरह के पुस्तक है। उसी के आधार पर वे बाइबल में व्यवस्थित की गई है। सो मित्र आज का समय हमरा समाप्त हो रहा है। उपस्थित होवे के लिये धन्यवाद। कृप्या कल के कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिये योजना बनाये और संसार के इस महत्वपूर्ण पुस्तक के महत्वपूर्ण अध्यन में बराबर उपस्थित होने दूसरां को भी कार्यक्रम में आमंत्रित करे। जो परमेश्वर के वचन को जानने के रूची रखते हो, प्रभु आज के वचन से आपको आशिष दे।

-ःआमिनः-

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